Monday, December 24, 2012

"बस" यही बचा था.....





गुस्सा....गुस्से का मजाक....मजाक में सियासत और सियासत में शोर...और शोर की कोई भाषा नहीं होती....और सरकार उसे समझना भी नहीं चाहती।इस आक्रोश को अंजाम का इंतजार नहीं है....जिद के साथ फूटा है और बदलाव इसकी बुनियादी शर्त है।मुल्क की बेटियां गुस्से में हैं..."शहर के आंखों का पानी मर गया है....और यहां इतना पानी "कलंक" को धोने के लिए बहा दिया""ये प्रतिरोध लोकतंत्र की प्रस्तावना का हस्ताक्षर है।जिसे जितना समझना मुश्किल है उससे ज्यादा पहचानना....अनपढ़ सरकार के लिए तो यही लगता है"16 दिसंबर 2012की रात 9.30 बजे दिल्ली में फिल्म देखकर एक लड़का और लड़की महिपालपुर जाने के लिए बस का इंतजार करते हैं तभी एक खाली बस आकर रूकती है लड़की पूछती है कहां जाएगी....बसवाला बोलता है महिपालपुर जाएगी।दोनों बस में चढ़ जाते हैं।फिर बस में जो कुछ होता है उसे शब्दकोश में दरिंदगी कहते हैं।उस चलती बस में 23 साल की लड़की के साथ 6 बदमाश गैंगरेप करते हैं....जब लड़का विरोध करता है तो उसके सिर पर लोहे के रॉड से हमला कर देते हैं फिर उसी जंग लगे रॉड को लड़की के गुप्तांग में डाल देते हैं।और फिर चलती बस से दोनों को फेंक देते हैं....मरा हुआ समझ कर।लेकिन जब जीने की तमन्नाओं की दस्तक देती है तो मौत को भी मुड़ना होता है। सड़क पर लाश की तरह पड़ी लड़की पर लोगों की नजरें फरिश्ते की तरह पड़ी तो....लड़की की आंखे सफदरजंग के अस्पताल में खुली।लेकिन तबतक रात की सिसकियां....सुर्खियां बन चुकी थी।हालत नाजुक था....रॉड की वजह से पूरे शरीर में इंफेक्शन फैल चुका था....रॉड की वजह से छोटी आंत को निकालना पड़ा।इस बर्बरता पर पूरा देश आहत था....लेकिन "दिल्ली पुलिस अपनी काहिलियत से बर्बरता की इस दुस्साहस के दुशासनों को सम्मानित बना रही थी"।इस नाकामी पर लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर था....बिना किसी पार्टी के.... बिना किसी बुलावे के...बिना किसी लालच के....बिना किसी दवाब के लोगों का हुजूम हुक्मरानों से टकराने निकल पड़ा।"गुस्से के धधकते ज्वालामुखी को देख
पुलिस ने जब तक सभी 6 आरोपियों को पकड़ती तब तक ज्वालामुखी फट चुका था।.पूरी दिल्ली गुस्से के "छोटे-छोटे द्वीपों " में तब्दील हो गयी थी।अब फांसी से कम कुछ भी नहीं मंजूर था"।इसी इंसाफ के साथ इंडियागेट पर धावा बोला....हल्ला बोला....आवाज आयी नजर तेरी बुरी पर्दा मैं क्यों करूं।गुस्से से डरी सहमी सरकार के गृहमंत्री शिंदे साहब तीन दिन बाद बाहर निकले।कहा,फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई होगी...काले शीशे उतारे जाएंगे....रात में बसों की संख्या बढ़ायी जाएंगी....पेट्रोलिंग बढ़ायी जाएगी...चेकिंग की जाएगी....कानून में संशोधन पर नजरें इनायत की जाएगी...और "सहूलियत गिनवाते गिनवाते बेटियां भी गिना दिए।कहा, उनकी भी तीन बेटियां उन्हें भी देश की चिंता है....शिंदे यहीं नहीं रूके कहां साथ में बैठे आरपीएन सिंह की भी तीन बेटियां है।इतना सुनते ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बावले हो गए।कहा कि हमारी भी तीन बेटियां हैं...नियंत्रित तापमान में "विवशता के वजीर" ने गुस्सा को जायज बताने के लिए पूरा ज्ञान लगा दिया। "इतने बड़े ज्ञानी " होने के बावजूद "औरत होने का अर्थ और अनर्थ " के अंतर को समझने में प्रधानमंत्री ने 6दिन लगा दिया "।बात बात पर कैमरे के सामने बेझिझक चमकने वाली सुषमा ने भी 140 अक्षरों वाले ट्विट से काम चला लिया।"सत्ता से लेकर विपक्ष तक विश्वास पर हुए प्रचंड आघात के बाद अब राजनीति को अपना रास्ता बदलना होगा और रंग भी"22 दिसंबर की सुबह 16 दिसंबर की "रात से ज्यादा हालात के अंधेरे में डूबी थी "......इस बार इंडिया गेट नहीं राजपथ पर गुस्से की सुनामी आयी थी....पुलिस और युवाओं में टकराव संग्राम में बदल गयी।"राजपथ लथपथ हो चुका था.... "लाचार लोकतंत्र की झांकी" को पूरी दुनिया ने देखा "।लोगों को जैसे तैसे खदेड़कर राजपथ को रात होने कर खाली कराया गया....रात होते होते शिंदे साहब फिर बाहर निकले...कहा कि 24 दिसंबर को रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं इसलिए लोग अपने अपने घर लौट जाएं।" शिंदे को चिंता थी कि पुतिन आएंगे-जाएंगे कैसे पूरा रास्ता तो प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया है""जैसे विरोध प्रदर्शन देखकर पुतिन की आंखे "भादों" हो जाएंगी "।पुतिन आए और चले भी गए ।पुतिन के जाते ही ओबामा के देश अमेरिका से तेजेन्द्र खन्ना भी हांफते हांफते दिल्ली पहुंचे।जब आंसू गैस के गोले आवाज को नहीं दबा सके तो गवर्नर साहब ने पुलिस की ओर बंदूक घुमा दी।कहा......दो ACP सस्पेंड और दो DCP जवाब दें।"फैसलों की तपिश में गुस्से की धुंध नहीं छंटी...बल्कि गुस्से का तिरपाल पूरे देश पर छा गया है"।अब तो गैंगरेप की शिकार लड़की की आवाज सवा सौ करोंड़ हिंदुस्तानियों की आवाज बन गयी है"।इस आवाज में दोस्तों से पुकार है...दस्तूर से गुजारिश है...देख रहे हो क्या....सुन रहे हो क्या...।अरमानों की इस यात्रा में नए साथियों का साथ चाहिए....नयी आवाजों का...नयी नजरों का....नये नायकों का।इस फरियाद में नए फसाने की आधारशिला है...आप सुन रहे हैं क्या..."।इस आवाज को अनसुना करने वाले इतिहास के गुनहगार कह जाएंगे।इसलिए जज्बातों की जुंबिश पर हुकूमत से लोहो ले रहे हैं।"उनकी लापरवाही के शीशे पर अपने होने का पत्थर उछाल रहे हैं।और अपनी आंखो में प्रशासन का धोखा महसूस कर रहे हैं ..जो आंसू गैस के शक्ल में है"।नार्थ और साउथ ब्लाक पर उमड़ा हुजूम अपने हुकमरानों से पूछ रहा है कबतक भरोसे के आइने में भविष्य का बदसूरत चेहरा देखते रहेंगे।इस बार चोट बहुत गहरी है।"आधी आबादी के लिए....उस लड़की के लिए जो बिना किसी जुर्म के सबसे बड़ी याचना भुगत रही है।इस आक्रोश में महिलाएं अपने वजूद की गुंजाइश देख रही हैं...इस आक्रोश में अपनाम नहीं फरमान है औरतों को देखने वाली नजरों में आदमियत देखने वाला नूर पैदा करती हैं। ये आक्रोश अब अंजाम के रास्ते पर हैं।इस आवाज को बदली हुई सियासत चाहिए ...बदला हुआ समाज चाहिए .....बदले हुए नियम चाहिए ....आप ही बताइए क्या ज्यादा मांग रही हैं बेटियां "