Saturday, May 26, 2012

उपेक्षा से उपलब्धि तक....


आध्यात्म की किताबों में पुरोहितों की अपनी अहमियत है और रस्मों रिवाज की अपनी।लेकिन जब वर्जनाएं टूटती हैं तो आवाज कम असर ज्यादा होती है ।कुछ इसी तरह जाति के जंजाल में उलझी हिंदू धर्म की सामंति मिथक को तोड़ने में संघ लगी है।
दौरों के दस्तूर से समाज नहीं बदला करते।और जब दस्तूर....दस्तावेज बनकर भारतीय समाज पर बोझ बनने लगे तो उसे बदलना मुश्किल हो जाता है।लेकिन "संघ हिंदू समाज के उस कालखंड को बदलने में लगी है जिसमें सिर्फ जाति से सम्मान पाना ब्राह्मणों का हक अनिवार्य सत्ता के तौर पर स्थापित है"।संघ ने इस हक मे हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए हिम्मत दिखायी है।महाराष्ट्र के नासिक में संघ की अनुसांगिक संगठन शंकराचार्य न्यास 14 दिन की ट्रेनिंग कैम्प में दलितों को पूजा-पाठ,वेद और धार्मिक कर्माकांड से जुड़ी शिक्षा देकर एक मिसाल कायम की है।ऐसी मिसाल जिस पर ना तो राजनीति का रंज हावी हो सकता है और ना ही साम्प्रदयिकता का रंग चढ़ सकता है।इस कैम्प मे शोलापुर के 38 दलितत शिक्षा दीक्षा लेकर पुरोहित बनेंगे। इन्हे ट्रेनिंग देने के लिए देने के लिए त्र्यम्बकेश्वर समेत देश भऱ के मशहूर पुजारी मौजूद रहे।"समर्पण,सहनशीलता के साथ संयम के चौखट पर ये दलित अब पंडित कहलाएंगे "।इस ट्रेनिंग कैम्प में वेद,पंचांग,संस्कृत का उच्चारण,भगवान गणशे पूजा,भगवान सत्यनारायण पूजा,कलश पूजा,नामकरण संस्कार,नवग्रह पूजा,शादी की रस्मों रिवाज समेत धार्मिक कार्यक्रमों की शिक्षा लेने वाले "ये दलित अब उन कार्यो के लिए वर्जित नहीं माने जाएंगे जिसके वजह से हिंदू धर्म की मान्यताओं पर मिथक हावी रहता था "।ऐसा नहीं है कि संघ के इस कदम का विरोध नहीं होगा।लेकिन ये भी सच है की रामायण लिखने वाले वाल्मिकी भी ब्राह्मण नहीं थे और महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी ब्राह्मण नहीं थे।"जिस समाज में छुआछूत का रोग मानव सभ्यता के विकास की समूची प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है ।उसी समाज में संघ ने दलितों को पुरोहित बनाकर ऐसी लकीर खींची है जिसे ना तो तर्क से छोटा किया जा सकता है और ना ही शर्त से मिटाया जा सकता है।क्यों कि संघ ने ब्राह्मणवादी भ्रम को तोड़कर दलितों को एक आदर्श के तौर पर स्थापित किया है"

Saturday, May 12, 2012

सत्यमेव या "व्यर्थमेव जयते"

इस खबर को पढ़ने के बाद सत्यमेव जयते की तरह भावनाओं का भूचाल भले ना आए....लेकिन दिल पर जरूर लगेगी।बर्बर रवायतों का दौर सदियों से जारी है लेकिन ओड़िशा में जो कुछ हुआ उससे हैवानों पर यकीन करना आसान हो गया संस्कार,परंपरा,रूढ़ियां और दुनियादारी के मायाजाल में आप भले ही फंस कर सामाजिक हो गए हों लेकिन वहशी बनने के लिए ऐसी कोई शर्त जरूरी नहीं।दर्द की दरिया में डूबी ये घटना भुवनेश्वर की है । जहां एक गर्भवती महिला की जान लेने के लिए दरिदों ने क्रूरता की सारी हदें तोड़ डाली।मीनी प्रधान नाम की इस महिला को जान से मारने के लिए महानदी में नीचे फेंक दिया।मीनी नदी के बजाय़ नदी पर बने बैराज के 
फ्लोर पर जा गिरी।मौत से लड़ती मीनी की ना बोलने की हालत थी ना हिलने की हिम्मत।दर्द का अजायबघर बनी मीनी एक-एक सांस के लिए संघर्ष रही थी।ताकत जुटा भी लेती जो बिना सहारे के निकलना नामुमकिन 
था।रात के अंधेरे में फेंकी गयी मीनी को मरा समझकर जाने वाले हैवानों ये नहीं सोचा था कि मीनी अगर जिंदा बच गई तो उनका बचना नामुमकिन है।हुआ भी वही...सुबह कि किरणें निकली तो कोहराम मच गया।आमिर के "सत्यमेव जयते " की असर की बात कर रहे थे और यहां तो लिंगभेद की लड़ाई में मीनी लहूलूहान होकर मौत की मेहरबानी पर सिसक रही थी।तभी नदी पर बने पुल से गुजरते राहगीर की नजर मीनी पर फरिश्ते की तरह पड़ी।धीरे-धीरे लोगों का हुजूम भी जुटने लगा। लेकिन ये हुजूम तमाशा देखने वाली नही बल्कि तस्वीर बदलने वाली थी ।धूप कि किरणों से मीनी के शरीर मे आयी हरकत को देखते ही कहानी समझ में आने लगी।जिम्मेदार नागरिक की तरह लोगों ने फौरन पुलिस और फायर ब्रिगेड को बुलाया।मीनी को बचाने के लिए जवानों को रेस्क्यू ऑपरेशन करना पड़ा।लोंगो की मदद के बदौलत घायल मीनी को सुरक्षित बचा लिया गया।जुल्म की तवारीख पर मीनी की तकदीर भारी पड़ गयी। अस्पताल में भर्ती मीनी ने जब जुबान खोला तो एक-एक शब्द सवालों के खंजर बन गए थे।मीनी भुवनेश्वर में एक रिटायर एडिश्नल जज एस. के. रॉय के घर नौकरानी थी।जिसके साथ रिटायर जज के बेटे वकील सत्यव्रत रॉय ने जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया,फिर शादी भी कर ली।लेकिन जज परिवार ने अपने रूतबे पर कलंक लगते देख सत्यव्रत रॉय की शादी दूसरी लड़की से तय कर दी।इस बीच जब मीनी के गर्भवती होने की खबर ससुरालवालों को लगी तो मीनी से ज्यादा ससुरालवालों का उठना बैठना दुश्वार हो गया।गोद भराई पर घरवालों को उपहार देना था ....खुशियां बाटना था ...सपनों को साझा करना था ....लेकिन ससुरालवालों ने मीनी के दामन को कांटों से भर दिया।ससुरालवाले मीनी पर भ्रूण हत्या का दवाब डालने लगे।जिंदादिल मीनी ने भ्रूणहत्या से इनकार कर दिया।उसे क्या पता था उसकी जिद...उसी की जिंदगी पर बोझ बनने वाली है।मीनी के इनकार करने पर ससुरालवालों ने भाडे़ के दरिदों को मीनी को जान से मारने के लिए भेजा।लेकिन मौत से दो -दो हाथ करके मीनी समाज को आइना दिखाया....और समाज से ज्यादा ससुरालवालों को।पुलिस ने मीनी के मुल्जिम रिटायर एडिश्नल जज एस. के. रॉय की पत्नी और बेटे समेत केस से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया।मीनी और भुवनेश्वर तो सिर्फ सूचना है ऐसी घटनाएं किसी भी शहर में किसी भी बेटी के साथ हो सकता है ।"मानव विकास के प्रक्रिया को तमाचा मारने वाली ये तस्वीर एक ऐसी दस्तावेज है जो बेटियों को दर्द के अजायबघर बनाने से रोकेंगी।कहते हैं बेटियां जन्नत से नूर भर लाती है और यहां तो ससुरालवाले मौत सौगात देने की कोशिश कर रहे थे।जज्बातों को झकझोरने वाली ऐसी घटनाएं समूची मानव सभ्यता के विकास पर सवाल खड़े करती है।दौरे के दस्तूर से समाज नहीं बदला करते।सदियों बाद भी अगर यहीं पहुंचना था तो बर्बर हुई है समाज की चेतना। क्यों मीनी अगर जिंदा है ये महज एक इत्तेफाक है।आप बताइए कसूरवार कौन है....आप कहेंगे सत्यव्रत ...हम कहेगें क्या एक सत्यव्रत का सवाल है"