आध्यात्म
की किताबों में पुरोहितों की
अपनी अहमियत है और रस्मों
रिवाज की अपनी।लेकिन जब
वर्जनाएं टूटती हैं तो आवाज
कम असर ज्यादा होती है ।कुछ
इसी तरह जाति के जंजाल में
उलझी हिंदू धर्म की सामंति
मिथक को तोड़ने में संघ लगी
है।


दौरों
के दस्तूर से समाज नहीं बदला
करते।और जब दस्तूर....दस्तावेज
बनकर भारतीय समाज पर बोझ बनने
लगे तो उसे बदलना मुश्किल हो
जाता है।लेकिन
"संघ
हिंदू समाज के उस कालखंड को
बदलने में लगी है जिसमें सिर्फ
जाति से सम्मान पाना ब्राह्मणों
का हक अनिवार्य सत्ता के तौर
पर स्थापित है"।संघ
ने इस हक मे हिस्सेदारी बढ़ाने
के लिए हिम्मत दिखायी है।महाराष्ट्र
के नासिक में संघ की अनुसांगिक
संगठन शंकराचार्य न्यास 14
दिन
की ट्रेनिंग कैम्प में दलितों
को पूजा-पाठ,वेद
और धार्मिक कर्माकांड से जुड़ी
शिक्षा देकर एक मिसाल कायम
की है।ऐसी
मिसाल जिस पर ना तो राजनीति
का रंज हावी हो सकता है और
ना ही साम्प्रदयिकता का रंग
चढ़ सकता है।इस
कैम्प मे शोलापुर के 38
दलितत
शिक्षा दीक्षा लेकर पुरोहित
बनेंगे। इन्हे ट्रेनिंग देने
के लिए देने के लिए त्र्यम्बकेश्वर
समेत देश भऱ के मशहूर पुजारी
मौजूद रहे।"समर्पण,सहनशीलता के साथ संयम के चौखट पर ये
दलित अब पंडित कहलाएंगे "।इस
ट्रेनिंग कैम्प में वेद,पंचांग,संस्कृत
का उच्चारण,भगवान
गणशे पूजा,भगवान
सत्यनारायण पूजा,कलश
पूजा,नामकरण
संस्कार,नवग्रह
पूजा,शादी
की रस्मों रिवाज समेत धार्मिक
कार्यक्रमों की शिक्षा लेने
वाले "ये
दलित अब उन कार्यो के लिए वर्जित
नहीं माने जाएंगे जिसके वजह
से हिंदू धर्म की मान्यताओं
पर मिथक हावी रहता था "।ऐसा
नहीं है कि संघ के इस कदम का
विरोध नहीं होगा।लेकिन ये भी
सच है की रामायण लिखने वाले
वाल्मिकी भी ब्राह्मण नहीं
थे और महाभारत लिखने वाले वेद
व्यास भी ब्राह्मण नहीं थे।"जिस
समाज में छुआछूत का रोग मानव
सभ्यता के विकास की समूची
प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती
है ।उसी समाज में संघ ने दलितों
को पुरोहित बनाकर ऐसी लकीर
खींची है जिसे ना तो तर्क से
छोटा किया जा सकता है और ना
ही शर्त से मिटाया जा सकता
है।क्यों कि संघ ने ब्राह्मणवादी
भ्रम को तोड़कर दलितों को
एक आदर्श के तौर पर स्थापित
किया है"।
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