Monday, August 29, 2011

अन्ना की "पुरी"कथा

चलिए कम से कम अन्ना का नशा तो उतरा।वरना शिथिल सोसाइटी ने तो "रण बीच चौकड़ी भरने वालों " की हवा निकाल दी थी । अब तीर तलवार से नहीं...माइक , नारा और टोपी से पूरा मामला निपट जा रहा है। दिन में इंकलाबियों की फौज रात में मोमबत्ती बि-ग्रेड। इसमें उन्नीस -बीस होती अन्ना की सेहत । बारह दिन बाद यानी 28जुलाई 2011 को परमानेंट अनशनकारी अन्ना ने अनशन तोड़ा तो पूरा देश ऐसे खुश हुआ जैसे अनशन का विश्वकप जीत लिया हो। अन्ना के "बुढापे के इंश्योरेंस " के भाव का सूचकांक गुस्से के शेयर बाजार में इतने उंचे हो गए की सरकार को खरीदना मुश्किल हो गया।दलाल पथ के एक स्वामी को लगाया । स्वामी के वेश में अग्निवेश का खुलासा होते ही सरकार की "घातक ईमानदारी " और अग्निवेश की "वीभत्स सच्चाई " देश के सामने आ गयी । आजादी की दूसरी लड़ाई दलालों के नेतृत्व में लड़ी गयी।







































अनशन के साइड इफेक्ट भी देखिए देश के सारे षड़यंत्रकारियों को एक कर दिया।बस अमर सिंह और दिग्विजय सिंह छूट गए।दोनों पता नहीं किसको फंसाने के लिए कौन सी चाल सोच रहे होंगे।मन है विश्वास पूरा है विश्वास गाते गाते....कुमार विश्वास से ओमपुरी ने माइक थामकर सरकार की छिपी हुई "दुर्लभ विशेषताओं" को गिना डाली।नालायक ,गंवार और अनपढ़ जैसे शब्दों का तमगा माननीयों को दिया तो "जेपी की शुक्राणु "से पैदा हुए लालू और शरद यादव को "सच्चाई का एहसास " होते ही संसद में बमक पड़े।इनकी बातें जेपी से शुरू होती है जेपी पर ही खत्म होती है।"बस समझ लिजिए...लालू ना हुए जेपी के.......हो गए"।अब जाकर ओमपुरी के ताने पर इनकी नींद खुली है।अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं …......दनुजबनकृशानुम , ग्यानिनामअग्रगण्यं …..लोकपाल कम लोचपाल ज्यादा है।उपर से आरक्षण ।आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाने वालों के हाथ तो मानों ब्रम्हास्त्र की तरह लोकहास्त्त्र लग गया।।लोकपाल बिल के बाद साम्प्रदायिक बिल और रॉइट टू रिकॉल जैसे बिल के लिए सरफरोशी छाप समर्थको की सही जरूरत पड़ेगी लेकिन उसके लिए पता नहीं अन्ना के टोपी छाप रक्तबीजों की फौज आएगी या नहीं लेकिन इतना जरूर है इस बिल के लिए अन्ना के अनशन की सबसे बड़ी जरूरत होगी।लेकिन यहां ऐसी अंधेरगर्दी मची है की.... धन और भक्ति खूब बटेगा...अपना अपना छोड़के।वाह.... विद्यावान गुणी अति चातुर.....

इस अनशन की "मर्डर -मिस्ट्री " भी समझना होगा

1.सरकार को सरकारी अंदाज में अन्ना की भूख से निपटते देख टीम हन्ना (हां और नां में फंसी )की सेहत सरकार से भी ज्यादा खराब थी ।

2.सरकारी तर्क और अन्ना की शर्त के फर्क को समझने में 12 दिन इसलिए लगे कि दोनों अपने अड़ियल ईमानदारी पर "भाव खा रहे थे "

3.सरकार पहले मान लेती तो इसी रामलीला मैदान में तुरंत पूरी जीत की घोषणा हो जाती ।इसलिए सरकार ऐसे मोड़ पर आकर मानी जहां से अन्ना का रास्ता संविधान ने बंद कर दिया था

4.स्टेडिंग कमेटी को प्रस्ताव भेजकर टीम हन्ना की शराफत पर बदनीयति का चादर ओढ़ा दिया

5.गुमनाम जश्न के लिए पूरा देश ऐसे बेचैन था जैसे कल तक लोकतंत्र ,राजा के साथ तिहाड़ में बंद था

इस अनशन ने कई सूरमाओं का खारिज कर दिया। जिनके बयानों से लोकतंत्र बोझ लगता था। कपिल सिब्बल से लेकर संदीप दीक्षित जैसे कुछ समझदार नेताओं ने इस बोझ का वजन इतना ज्यादा बढ़ा दिया था कि टीम अन्ना का उठना मुश्किल हो गया था। लेकिन "नारियल -जूस और शहद से भरी दोपहरी में अन्ना ने ऐसा रोजा खोला कि हैप्पी एंडिग की तरह सब अपनी अपनी सीट से उठे और चलते बने ।जैसे " सबका मालिक अन्ना "का नून शो देख रहे थे "। आजादी की पहली लड़ाई में लाल बाल पाल कक्षा आठ के इतिहास में जगह बनाने में कामयाब हो गए....लेकिन " आजादी की दूसरी लड़ाई के लाल- बाल -पाल उर्फ भूषण,हेगड़े और केजरीवाल पर मंथन चल रहा है "।पूरी लड़ाई जीतने के बाद पता चल जाएगा।वैसे अन्ना छाप अनशन ने बड़ी छाप छोड़ी है..हो सकता है आने वाले दिनों में अन्ना की आधी जीत से पहले ही सरकार "अनशन अधिनियम "को पारित कर ले।


Monday, August 22, 2011

रिटर्न ऑफ द "अन्ना"

बढते गये....जुड़ते गये...मिलते गये....खिलते गये....अपनी उम्मीद..टिके रहे...आवाजा निकली...डटे रहे....फरमाइश नहीं...फुर्सत निकालो....आवाज आयी...चलों जवानों..घड़ी है...बदलाव की....चलेगी नहीं ठहराव की...डंके की चोट पर...जिंदादिली की ज्योत पर....सरकार घबरायी...अन्ना की आंधी....सरकार डगमगायी...अन्ना की आंधी...बढते गए..कारंवा बनता गया...हिम्मत के हिमालय में सरकारी शर्तो की सुराख...हम रुके नहीं...हिले नहीं...भ्रष्टाचार के खिलाफ...गिले नहीं...हौंसलों की बांध पर....जज्बातों की जाल पर....साथी हाथ बढ़ाते गये...बच्चे बूढ़े...चिल्लाते रहे....बच्चा बच्चा बोलेगा...भ्रष्टाचार तोड़ेगा...जवानी चल पड़ी...सरकार हिल गयी...शर्तों की पैमाइश...लक्ष्य की गुंजाइश...हिन्दुस्तान जागा...बंधुत्व का धागा...चल पड़े दो डग...पूछते नहीं कब-कब...ये तूफान है...ये चट्टान है...अन्ना की शान है...सरकार पर सवाल है....बेइमानों का खाल है....चाहे उतार दो चमड़ी...चाहे उतार दो खाल...संसद में पारित होगा शान से लोकपाल...लोकतंत्र में भ्रष्टाचार...नहीं चलेगा नहीं चलेगा...देश के नेताओं शर्म करो....बहुत खाया अब धर्म करो....






































































सवा अरब लोगों को को एक सवाल के जवाब का इंतजार है लेकिन रामलीला मैदान से महज चार किलोमीटर दूरी पर रहने वाले पीएम को जवाब देने की फुर्सत नहीं।।ये सवाल है...जनलोकपाल का....ये सवाल है...आवाम की आवाज का...ये सवाल है आवाज की पहचान का।चार किलोमीटर दूर हिन्दुस्तान की धड़क रहा है लेकिन उसे सुनने को पीएम के पास फुर्सत नहीं।सवा अरब आवाम और आवाम की हसरतें और हसरतों की हिस्सेदारी के साथ ये क्रूर मजाक है।आवाम से कोई सरकार इतनी दूर कैसे हो सकती है कि चार किलोमीटर दूर से गरजते हिन्दुस्तान को नहीं सुन पा रही है। इस बैचानी और मजबूरी के पीछे की रवायत ने भारतीय राजनीति को शर्मिदा कर दिया है।इस दौर की सबसे बड़ी उथल-पुथल पर सरकार जनता का मजाक उड़ा रही है. और विपक्षी दल अपने दड़बों में छिप गए है। "जनता के उम्मीदों को धकिया कर...हुक्मरानों के आचरण में जो राजनीतिक निखार आ रहा है...कहीं ऐसा ना हो वो निखार...खूंखार हो जाए "। गजब है सरकार.... गजब है ….कांग्रेस और गजब है उसके रहनुमा।आवाम की हुंकार को भले ही अनसुना कर दें सरकार लेकिन भारतीय राजनीति में इसकी "गूंज" कांग्रेस से हिसाब से लेती रहेगी।