Monday, February 28, 2011

बैंड बजाया बजट...

इसे कहते हैं गरीबी में पैंट गिला।पहले बेइज्जती की नमकीन खिला कर बेशर्मों के सरदार ने उसूलों की पोटली उड़ा दी।अब आम बजट से देश के गरीबों की इज्जत पर इरादों की ऐसी इमारत खड़ी कर की है जिसमें सलाना 1.80 लाख की औकात रखने वालों से झाड़ू पोछा कराया जा रहा हैअर्थ का ये अनर्थशास्त्र देश के गरीबों के गाल झन्नाटेदार तमाचा है।बड़े बड़े वीआईपी अस्पतालों में अब सर्विस टैक्स लगेगा।जैसे शौक पूरा करने के लिए कोई अस्पताल जाता हो।पता नहीं किस सरकारी अस्पताल में एसी लगी है।अगर किसी गरीब को जान बचाने के लिए बड़े अस्पताल में भर्ती कराना पड़े तो पहले सियासत के इस हरिश्चन्द्र को कर देना होगा।जैसे सर्विस टैक्स देकर जी गये तो क्या ...मर गये तो क्या।राज्य की सारी कल्याणकारी अवधारणा गयी तेल लेने।आगे सुनिए होटलों में एक हजार का कमरा लेने पर सर्विस टैक्स देना होगा।प्रणव बाबू बताएंगे....देश के किस होटल में एक हजार से कम का कमरा मिलता है।एलपीजी.किरोसीन और खाद में 2012 से कैश सब्सिडी देंगे।दाद देनी होगी दादा की जिन्होने गरीबी की जाति तय करने में मर्दानगी दिखाई है।अब सब्सिडी मिलेगी पूछ – पूछ।सब्सिडी की बोझ से दादा इतना दब गये थे कि जनता की जेब पर सऱेआम डाका डाल दिया।जैसे तीन सौ साठ रूपये में एक एलपीजी गैस सिलेंडर खरीदने वालों को सीधे दूना देना पड़ सकता है।क्योंकि सरकारी रहमोकरम की चाबुक अब सब पर नहीं चलेगा।उन्ही पर चलेगा जो दादा की दादागिरी से बच जाएंगे।सिलेंडर छोड़िए खाद पर भी सरकार कैश सब्सिडी देगी।जैसे इनके सब्सिडी के एहसान चले किसान फसल उगाते थे।दाद भूल गये कि इंजीनियर,डॉक्टर बनना आसान है लेकिन इस कृषिप्रधान देश में किसान बनना आसान नहीं है।सरकार में एफसीआई के काहिल अफसरों की फौज को ढ़ोने वाली कृषिमंत्रालय तो किसानों को मेहनत पर पलीता लगाने में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है।महंगाई पर जुबान पर ताला लग जाता है।28 फरवरी 2011के एक घंटे के बजट भाषण में दादा तो जैसे महंगाई को सरकारी अमानत घर में बंद करके आए थे।जनता रामायण की तरह प्रणव बाबू को सुन रही थी।और वित्तमंत्री जनता की जेब पर चूना लगा रहे थे।भाषण नहीं दिया है...देश के गरीबों को दुत्कारा दिया है दादा ने।महज 2060 रूपये की बचत दिखा कर दादा ने मरने वालों से भी टैक्स वसूलने का तजुर्बा दिखा दिया।गठबंधन धर्म से राजकोष को 1लाख 76 हजार का चूना लगा।लेकिन जिन्होने चूना लगाया है उनसे सरकार वसूल लेती तो उनकी गिनती हिजड़ों की जमात में नहीं होती और ना ही महंगाई के आगे नपुंसक होती।दादा ने तो जोश में तलवार ही उछाल दी।खैर...1.80 लाख रूपये तक टैक्स मुक्त रखने के बदले दादा ने कैश सब्सिडी देने का ऐसा खेल खेला है जिसमें जनता सिर्फ शर्मनाक अफसोस कर सकती है।



Friday, February 25, 2011

भारतीय रेल हिजड़ों के आगे नपुंसक है...

चेहरे से टपकती तिलमिलाहट,जुबानी तुनकमिजाजी और ऊपर से अंगुलियों के तेवर विरोधियों को बर्दाश्त नहीं हो रहे थे।ममता ने भारतीय रेल पर समता दिखायी।लेकिन....विरोधियों को ममता की क्षमता नहीं पची और सियासी उल्टी कर दी।विरोधियों को मछली की आंख की तरह केवल बंगाल दिख रहा था।जब जब बंगाल का जिक्र आया लुटियन्स के टीले पर बैठे माननीयों की जुबान कटार बन गयी।ममता मेल में श्रीमानों की फौज को जगह नहीं मिली तो बौखलाहट में कह दिया बम बम बंगाल,बाकी कंगाल।पता नहीं विरोधियों ने कौन सा हिसाब पढा है।जब दुरंतो बंगाल के सियालदह से उड़ीसा के पुरी तक चलेगी ।फिर दुरंतों को सिर्फ बंगाल से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है।रेल फैक्ट्री जब बंगाल में लगेगा तो बंगाल के लोगों को रोजगार मिलेगा।यूपी में लगेगा तो यूपी के लोगों को रोजगार मिलेगा।इतनी सी बात समझ में नहीं आयी।उल्टे कुतर्कों की आंच पर ऐसी अफवाह पकायी की उनकी सियासी स्वार्थ की दुर्गंध में भारतीय रेल का दम घुटने लगा।ममता के रेल बजट पर विरोध का एहसान करने वालों सुन लो, ममता एक्सप्रेस अब नहीं रूकने वाली।पटरीयां उखाड़ों ,पत्थर फेंको,चेन पुलिंग करो,बाजुओं में ताकत हो तो इंजन रोक लो।सिंगूर और नंदीग्राम के प्लेटफार्म से निकली ममता मेल अब रेड सिग्नल से नहीं रूकने वाली।
दीदी के पास राजनीतिक तजुर्बा है।इसी तजुर्बे से बंगाल में टीएमसी के बीज डाले थे।जिसकी फसल अब लहलहा रही है।लालू के जमाने में भी भारतीय रेल बिहार की जागीर बन गयी थी।तब तो जाहिलों की जमात ने लालू की छाछ को फूक फूक कर पीया था। अनंतकुमार रहे
हैं..बंगाल का बजट है।कीर्ति आजाद कह रहे है...बंगाल का बजट है।गोपी नाथ मुंडे कह रहे हैं...बंगाल का बजट है।शहनवाज हुसैन कह रहे हैं...बंगाल का बजट है।मोहन सिंह कह रहे हैं.. घटिया है।शरद यादव, रेल का काम समझा रहे हैं।योगी आदित्यनाथ, लॉलीपॉप बता रहे हैं।किसकी-किसकी बताएं..किसकी-किसकी सुनाएं।लालू की बकार नहीं निकल रही है।नीतिश निराशा की तपिश में झुलस रहे हैं।रामनाईक मुम्बई की चिंता में मरे जा रहे हैं।जैसे इनके रेलमंत्री बनते ही भारतीय रेल सुधर गयी थी।सुन लो... किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों भारतीय रेल हिजड़ों के आगे नपुंसक है। किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों भारतीय रेल भिखमंगों का जन्नत है।किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों डाकूओं के आगे आरपीए गिड़गिड़ाती है।कैसे पूछेंगे जनाब..जब ऐसे गंभीर मसले पर आंखो पर राजनीतिक चश्मा चढ़ा हो।ममता के रेल बजट के बाद ऐसे निकम्मे माननीयों की औकात से जनता भी वाकिफ हो गयी होगी।जो वोट लेने के दौरान वादों की पटरीयां बिछा गए थे।ममता तो सियासी सिग्नलों को तोड़कर जनता के दिलों में फिक्रों की बर्छी की तरह घुसने की जुर्रत की है।ऐसी जुर्रत जो भारतीय रेल को क्षेत्रिय सीमाओं से आजाद करके मंजिल के सफर का साथी बनाती है।

Tuesday, February 22, 2011

सख्त आंखों से पैबंद पर पहरा...

सियासत का रिएलिटी शो देखना हो तो यूपी आइए।यकीन मानिए जहां-जहां मायावती का दौरा हो रहा है।वहां-वहां से कानून भी रास्ता बदल ले रहा है।जान बचाने के लिए भाग रहा है..हांफ रहा है...गिड़गिड़ा रहा है....रो रहा है..चिल्ला रहा है... कानून।डर है कहीं मायावती के काफिले के नीचे ना आ जा ।बस समझ लीजिए.. कानून आगे आगे ...मायावती पीछे पीछे।20 फरवरी 2011 को गाजियाबाद में मायावती के दौरे की कहानी जानना आपके लिए बेहद जरूरी इसलिए है कि इस जिले से मायावती खुद ताल्लुक रखती हैं।यहां तक तो ठीक है।लेकिन जब ताल्लुक के साफ्टवेयर से तेवर का हार्डवेयर जुड़ता है तो नौकरशाहों से लेकर नकली खैरख्वाहों तक की पैं गिली हो जाती हैकुर्सी तो छोड़िए पतलून बचाने के लिए गाजियाबाद के वाहियात अफसरों की फौज ने गरीबों की तमन्नाओं की तकदीर को कुचलने के लिए बेशर्मी की ऐसी कालीन बिछायी थी जिस पर मायावती का पैर पड़ते ही दलितों का कलेजा छलनी हो गयासुबह जब गाजियाबाद के रघुनाथपुर गांव के लोगों की आंखे खुली तो सबसे पहले उनके आंखों की मुठभेड़ दरवाजे पर खड़ी शाही पल्टन से हुआ।कल तक थाने में नाक रगड़ने वाले दलितों की चौखट पर सांभा की तरह पुलिस पहरेदारी कर रही थी।एक एक घर कैदखाने में तब्दील हो गयी थी।मझ लिजिए हवा पर अख्तियार नहीं था वरना यूपी पुलिस तो सांसों पर भी पहरा लगा देती25 किलोमीटर पर मानवाधिकार ऑफिस है।30 किलोमीटर पर सुप्रीम कोर्ट है।और थाना पुलिस की क्या बात करें।इन्हे तो पहले से ही गुंडागर्दी का लाइसेंस मिला हुआ है।बस इतना समझ लीजिए रघुनाथपुर की गलियों में खाकी जुर्म के मुहावरे बदल रही थी।20 फरवरी को रविवार का दिन था।लेकिन मायावती के आने की खबर लगते ही डीएम से लेकर एसपी तक बच्चों को स्कूल पहुंचाने में लगे रहे।नये नये ड्रेस में ए बी सी डी पढ़ने वाले बच्चे क्या जाने आज क्या तूफान आने वाला है।लेकिन स्कूल के प्रिंसिपल से जब पूछा गया आज तो रविवार है।तो प्रिंसिपल साहब का हलक सूख गया।हाथों के तोता,मैना,कबूतर,कोयल सब उड़ गयेमायावती अस्पताल पहुंची...वहां भी खेल हो चुका था।पता नहीं मरीजों को कम्बल नसीब होता कि नहीं...लेकिन रविवार को सूबे के डॉक्टर के आने की खबर मिलते ही मरीजों की मौज हो गयी।


मायावती एक वार्ड में भर्ती मरीजों से पूछीं डॉक्टर आते हैं कि नहीं...तो कम्बल के नीचे से आवाज आती है....आते हैं।तहसील पहुंचती है...वहां भी पाप पुण्य का लेखा जेखा।अपनी हनक से तात्पर्य और निस्तारण के बीच अफसरों की औकात को धूल की तरह झाड़ दीमाया के गुमान की आंधी में सुशासन की चादर तिनके की तरह उड़ गयी।माया के हां में हां और ना में ना मिलाने का गुस्ताखी सौ बार करनी पड़े तो अफसरों की फौज कालिया की तरह करने को तैयार है।दौरे के दर्द से नौकरशाहों की निकली चीखों में सौदेबाजी की दुर्गंध आयी तो कहानी समझ में आने लगी। रजिस्टर चेक करने के लिए मायावती हैलिकाप्टर से दौरा कर रही हैं।नफा नुकसान की भनक लगते ही थोड़ी सी फटकार के बाद फटाफट वाला सिलसिला बरकरार रखने के लिए क्लास भी लगायीं।लेकिन राह चलते लगने वाले क्लास से जिले के मॉनिटरों में बदलाव आ जाता तो काफिले का रास्ता इंसाफ मांगने वाले नहीं रोकते लेकिन मायावती को कौन समझाए पत्थर और पैबंद का फर्कउन्हे तो निर्जीव पत्थरों में ही सियासी चेतना दिखती है।कल्याणकारी अवधारणा दिखती है।सदभावना दिखती है।पता नहीं और क्या क्या दिखता है।फिलहाल इस मसले पर संसद से लेकर सड़कों तक खौफनाक सन्नाटा पसरा है। इस कहानी की हकीकत पर पूर्णविराम लगने से पहले सवाल ये है कि जब मायावती को यही तमाशा करना था तो फाइलें लखनऊ में क्यों नही मंगवा लेती।कम से कम खौफ में मर मर कर जीने की तकलीफ तो लोंगो को नहीं उठानी पड़ती।

Tuesday, February 8, 2011

वेलेन्टाइन डे विशेष... (तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही)

फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली कि फिल्म हम दिल दे चुके सनम आपने देखी होगी।फिल्म में प्यार पर रिश्ते की कुर्बानी को दिखाने में ना जाने कितने रिटेक लेने पड़े होंगे।लेकिन इस कहानी को असल जिंदगी में बिना किसी रिटेक के आन्ध्र प्रदेश के धनंजय ने दोहराया।ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में वनराज बने अजय देवगन, नंदिनी बनी ऐश्वर्या को समीर बने सलमान से मिलाता हैं।

पहले इस तस्वीर को में तीनों किरदार के चेहरों को देखिये ।

हिम्मत,हसरतेंऔर हिस्सेदारी यही भाव है इनके चेहरे पर।इनका परिचय आगे कराएंगे।लेकिन उससे पहले आप को फ्लैशबैक में से चलते हैं।।एक तरफ रिश्ता था तो एक तरफ प्यार।एक तरफ खुशियां थी तो एक तरफ इंतजार।एक तरफ उम्मीदों का सावन तो एक तरफ तमन्नाओं की हरियाली।इन सबके बीच दांव पर लगी थी तीन जिंदगियां।प्यार की खातिर रिश्ते की कुर्बानी की ये अनोखी दास्तान है अनंतपुर की।तीन महिने पहले धनंजय ने हिंदुपुर की पवित्रा के साथ शादी की।नयी जिंदगी शुरू करने के लिए बधाइयों का दौर चला।लेकिन जिंदगी में खुशियों के खिलखिलाने से पहले ही अंधेरा छा गया।पवित्रा ने ससुराल जाने से इनकार कर दिया।परिवार की नीलाम होती इज्जत बचाने के लिए धनंजय ने पवित्रा के हाथ जोड़े....मिन्नतें की..रिश्ते की दुहाई दी।लेकिन पवित्रा का कलेजा तो जैसे पत्थर का बना था।गिड़गिड़ाते धनंजय की आंखो में आंसू देख पवित्रा पिघल गयी।पवित्रा की लड़खड़ाती जुबान से जैसे ही निकला..... मैं गोपी से प्यार करती हूं।धनंजय के पैरों तले जमीन खिसक गयी।लगा जैसे अरमानों के जनाजे को खुद ही कंधा दे रहा है।रिश्ते पर प्यार के अतीत की परछाई पड़ते ही धनंजय के हाथों से जिंदगी का अख्तियार छूटने लगा।ये तो था फ्लैशबैक...अब क्लाईमेक्स सुनिए।इस शर्मनाक सच्चाई को गले लगाने के लिए धनंजय एक कदम भी पीछे नहीं हटा।और निकल पड़ा पवित्रा को उसके प्यार गोपी से मुलाकात कराने।उफ...तक नहीं निकला धनंजय के मुंह से।रिश्ते रास्ते में बदल गये और मायूसी,मंजिल बन गयी।इस अनजान सफर में कई बार रिश्ते की आहट ने दिल का दरवाजा खटखटाया लेकिन धनंजय तो दिलेर निकला।मन के सवालों को इरादों से जवाब देता गया।और इसी उधेड़बुन में धनंजय,पवित्रा को लेकर पहुंच गया गोपी के चौखट पर।प्यार मंजिल तक पहुंच चुकी थी।बस गोपी का आना बाकी थी।लेकिन जब दरवाजा खुला तो गोपी के मुंह से बेवफाई सुनकर पवित्रा को जबरदस्त धक्का लगा।फिर..क्या।धरना प्रदर्शन,क्या हंगामा।मान मनौव्वल के दौरान पुलिस भी आ गयी। पुलिस को माजरा समझते देर नहीं लगी। और हाथों हाथ जोड़ी बना दी।3फरवरी 2011तक हम दिल दे चुके सनम दोहराया गया। लेकिन अगले ही दिन हम फंस चुके सनम हो गया।अगले दिन यानी 4 फरवरी 2011 को पवित्रा को प्यार की अंधेरगर्दी समझते देर नहीं लगी। और गोपी के साथ रहने से इनकार कर दिया।जिंदगी में आदमी खुशियों से समझौता नहीं कर पाता है। और यहां तो प्यार के लिए रिश्ता ही दांव पर लगा था।महानगरों की भागती जिंदगी की ऐसी ना जाने कितनी खबरें आती हैं जिसमें शक की चारदीवारी में घुट घुट कर इंसान दम तोड़ देता हैं।लेकिन दर्द का अजायबघर बने धनंजय ने तो शक की दीवारों को गिराकर प्यार को आजाद किया था।खैर...धनंजय ने जब गोपी को पवित्रा से मिलाया तो आंखे नम थी लेकिन चेहरा मुस्कुरा रहा था।वाकई रिश्ते की कुर्बानी देकर प्यार की बुनियाद रखने वाले बिरले ही मिलते हैं




Saturday, February 5, 2011

मंहगाई @ कायर मर्दानगी

आमदनी बढ़ी है इसलिए महंगाई बढ़ी है।और आमदनी बढ़ी है सरकारी योजनाओं से।पीएम का ये बयान सुनकर आप के तन बदन में आग लग गया होगा।अब आगे सुनिए.....गरीब लोग सरकारी योजनाओं के पैसे से चिकन,अंडा,दूध पी रहे हैं...इसलिए महंगाई बढी है।पीएम के इ बयान ने सरकारी भरोसे के चिथड़े उड़ा दिए।बयानों की बर्छी से गरीब जनता को ऐसा हला किया है कि गरीबी भी शर्मिन्दा है।गरीब जनता प्याज नहीं देख पा रही और निकम्मे नेता प्या पर राजनीतिक ब्याज जोड़ रहे हैं।सुन लो भाइयों...आज से अभी से अपने किस्मत पर भरोसा करना शुरू कर दो....इन निकम्मे नेताओं के भरोसे तो एक कप चाय मिलने से रही....भरपेट खाना तो दूर की बात है।जनता मरी जा रही है और सरकार महंगाई पर जश्न मना रही है।तोते से पूछो,टैरो कार्ड वाले से पूछो.तांत्रिक से पूछो,भिखारी से पूछो,लेकिन इस देश की सरका से मत पूछो।महंगाई कब कम होगी।प्रणव बाबू कह रहे है हमारे पास कोई जादुई चिरा नहीं है।आप के पास नहीं है तो किसके पास है प्रणव बाबू।नारा दिया था..आम आदमी के बढ़ते कदम....हर कदम पर भारत बुलंद।आदर्श राजा का भ्रष्टाचार कम पड़ी तो यूपीए सरकार महंगाई से भारत बुलंद कर रही है।कुछ महिना पहले ही एफसीआई की निकम्मी फौज को ढ़ोने वाली कृषि मंत्रालय की लापरवाही से लाखों टन गेहू सड़ गया।गेहूं से बदबू आने लगी।इस बेकद्री पर तो जानवरों की दीवाली मन गयी।क्या जरूरत है चरने की।स्टेशनों पर तो चोकर की जगह गेहूं जो मिल गया।बदइंतजामी की हद हो गयी और पवार साहब कह रहे है जगह कि कमी नहीं होगी।गेहूं सड़ाकर बंटाधारी निकम्मे अफसर अपनी काहिलियत निखार रहे थे।लेकिन पवार को रत्ती भर शर्म नहीं आयी।जैसे सड़ा गेहूं खाकर जी गए तो क्या... मर गए तो क्या।सुप्रीम कोर्ट से जब अर्थ का ये अनर्थशास्त्र नहीं देखा गया तो सरकार को हेकड़ी ढ़ीली की।सरकार ने इसका गु्स्सा निकाला जनता पर।खार खायी सरकार ने कहा जनता ज्यादा खा रही है इसलिए मंहगाई बढ़ रही है।ऊपर से लुटियन्स के टीले पर बैठे कल्याणकारी अवधारणा,सियासी चेतना की चिंता करने वाले जरा ढपोरशंखियों की बर्बरता देखिए।आमदनी बढ़ेगी तो.... महंगाई बढ़ेगीपीएम कह रहे हैं...हम क्या करें।वित्तमंत्री कह रहे हैं....हम क्य़ा करें।पवार साहब कह रहे हैं...हम क्या करें।कुछ मत करिए अपने कायर मर्दानगी पर ताली बजाइए।मौज करिए।मन ठीक हो तो भजन कीर्तन करिए।बाकी तो आप से तो कुछ होने वाला नहीं।देसी महंगाई के आगे पीएम की कैम्ब्रिजीआ इकॉनॉमिक्स गयी तेल लेने।बुजदिल पीएम इस अंधेरगर्दी को अपने पोथी में रामराज लिखते हैं।शर्म करो उस शक्तिबोध को जो गरीबो का हक मारने के लिए जालिम बना रहा है।जान लिजिए..अब प्रधानमंत्री भी उसी लाइन में आ गए हैं।सुन लो....आमदनी किसकी बढ़ी है।एयर कंडीशन में बैठकर मुफ्त का चिकन,मुर्ग मुसल्लम,कबाब,मछली,विरयानी उड़ाने वालों ये क्यों नहीं कहते अपने हाथों में आयी कलम जरा ज्यादा घूम गयी।श्रीमानों का वेतन जोड़ घटाके एक लाख बाइस हजार तक पहुंच गया है।और सरकार कह रही हैं गरीब जनता की आमदनी बढ़ी है।हमको लालीपाप थमाकर खजाने की चाभी घुमा दी।बस करिए आप का एहसान सहा नहीं जा रहा है।दाल मिल गयी तो तड़का लगाने में हैसिय़त पर आंच आने लगता है।सब्जी मिल गयी तो तेल भाव खा रहा है।दूध मिल गया तो चीनी चिल्ला रही है।प्याज देख लिया तो इनकमटैक्स का छापा पड़ जा रहा है।देश के गरीबों का चैन सूकून बाजार में गिरवी रखकर दिया।और सरकार कह रही है ..पेट्रोल, डीजल और किरोसीन का भाव जानने के लिए अरब देशों का अखबार पढ़िए।पता नहीं यूपीए सरकार के मंत्री कौन सा हिसाब पढ़े हैं।चीनी की कीमत तिगुनी हो गयी सरकार कहती है...चीनी मत खाओ।दाल की कीमत तिगुनी हो गयी सरकार कह रही है....मूंग की दाल खाओ।पेट्रोल की कीमत दोगुनी हो गयी सरकार कहती है...गाड़ी मत चलाओ।जिस देश की आबादी को दो वक्त की रोटी नही मिलता उनके बारे में सोच लेते तो आप का गुमान नहीं चुभता।हम तो जैसे तैसे जी लेंगे..जी ही रहे हैं।लेकिन ये मत भूलिए कि आवाम के तर्के विश्वास की आंधी में हुकूमतों के हवामहल तिनके की तरह उड़ जाती है।(जारी है...)


Wednesday, February 2, 2011

राजा से रंक.....



खून खौल उठेगा..उस तारीफ को सुनते तो।भ्रष्टाचार की दुर्लभ ऊंचाईयों पर ले जाने वाले राजा पर परम आदरणीय मनमोहन सिंह को नाज था।खबरदार,जो राजा पर कोई तोहमत लगाया...ब्ला ब्ला ब्ला।राजा के प्रति किसी वजीर की वफादारी का भारतीय लोकतंत्र में ये पहला चैप्टर है।आप को पता है राजा पीएम के दुलारे क्यों थे।क्योंकि

1.एलायंस के औलाद हैं।

2.यूपीए सरकार की जो योजनाएं बेचारे दलालों तक नहीं पहुंच पाती थी उसे राजा पहुंचाते थे।

3.काग्रेस के भड़ुओं पर से विश्वास उठ गया था।

4.दलाल प्रकोष्ठ संभालने में महारत।

5.लाइसेंस और पूछ पूछ...... देते थे।

और भी कई ऐसी खूबियां जो ए राजा की गुस्ताखी में शुमार थी।जिसे राजा ने सरकारी अकड़ की हार्डवेयर से जोड़कर देश के खजाने की वाट लगायी।सीएजी के मुताबिक टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रूपये का है।जिस पर जांच के लिए विपक्षी दलों ने जेपीसी की मांग की।लेकिन सरकार तो राजा की नादानी पर ऐसे गुर्रा रही थी जैस परछाईं देखकर कुत्ता गुर्राता है।राजा का हिसाब किताब सुनेंगे तो खून खौल उठेगा।राजा को जब मीडियाकर्मी ने घेरा थे तो अपनी करतूतों को नियमों के मुताबिक कहा कि पहले से जो नियम चली आ रही है उसी हिसाब से खजाने को चूना लगाया है।राजा की नादानी सीबीआई की आंखो की किरकिरी बन गयी। सीबीआई की तथाकथित चौबीस कैरेट की ईमानदारी , सरकारी बेईमानी के ट्रेडमार्क पर भारी पड़ गयी।जिस दामाद सीबीआई को कांग्रेस ने दुरूपयोग का लाइसेंस दिया था आज उसी सीबीआई ने राजा का घराना छिन लिया।पर सवाल ये है कि असली राजदार राडिया,बैजल और चंदोलिया जैसे बहेलिया की बेहयाई की बेकद्री क्यों हो रही है।ऐसे ही कुछ सवाल ऐसे है जो सीबीआई की सक्रियता पर सवाल उठाते हैं।


1.राजा की गिरफ्तारी करूणानिधि और सोनिया मुलाकात के बाद क्यों हुई ?

2.राजा को गिरफ्तार करने के लिए क्या सीबीआई को हरी झंडी मिली थी ?

3.क्या राजा की गिरफ्तारी का सियासी लाभ सिर्फ कांग्रेस को मिलेगा ?

4.बजट सत्र के लिए राजा कहीं सियासी शिकार तो नहीं हो गये ?

ऐसे बहुत से सवाल है जिससे कर भला तो हो बुरा टाइप का जवाब मिलेगा।खैर राजा को कैद मिलना था मिला।लेकिन खजाने को लगने वाला चूना का भरपाई कैसे होगा।इस चिंता से ज्यादा जरूरी ये है कि कैसे जाएगी राजा की हेकड़ी।इसके लिए कितना रगड़ना पड़ेगा।गैर कांग्रेसी दलों को पानी पी पीकर गरियाने वाले कांग्रेस की चक्की के रोटी खाने वालों.... राजा की गिरफ्तारी की खबर सुनते ही जुबान जीरो साइज की क्यों हो गयी।तब तो राजा के लिए हनकदार बातें निकलती थी।अब बकार क्यों नहीं निकल रहा है।तब तो जुबान कटार बन गयी थी।अब सिट्टी पिट्टी गुम क्यों हो गयी।गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है औऱ किसी मंत्री की सियासी मौत आती है तो सेवन रेसकोर्स की ओर भागता है।धिक्कार है यूपीए सरकार पर।जिसने गठबंधन धर्म के लिए देश की सम्प्रभुता की बोली लगा दी।पता नहीं किस गुनाम में कांग्रेस अपने अतीत के बोझ को सीने से चिपका कर रखती है।परिवारवाद जमात की कांग्रेस को जब आन्ध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी छाप कांग्रेस की आंच में झुलसते देखा तो सियासत की इस नयी वंशबेल को उखाड़ फेंका।सोनिया छाप तानाशाही रवैये को सींचने के लिए चापलूस कम पड़ गये तो दुर्भावनाओं से ग्रस्त दिग्विजय छाप दुर्योधनों को लाइसेंस दे दिया।सत्ता का मोह ऐसा लगा है कि पराजय के दौर में पाँखड से पीछा छुड़ाने का जी नहीं कर रहा है।परिवारवाद की विध्वंसक अवशेष में एक राजा अपने अभिमान का बीज ढूढ़ रहा था लेकिन उसे ये नहीं पता था कि जिसे वो अभिमान समझ रहा है वो एक मुगालता था।अब ना सत्ता का राज रहा और ना ही पार्टी का सिर पर ताज।