सियासत का रिएलिटी शो देखना हो तो यूपी आइए।यकीन मानिए जहां-जहां मायावती का दौरा हो रहा है।वहां-वहां से कानून भी रास्ता बदल ले रहा है।जान बचाने के लिए भाग रहा है..हांफ रहा है...गिड़गिड़ा रहा है....रो रहा है..चिल्ला रहा है... कानून।डर है कहीं मायावती के काफिले के नीचे ना आ जाए ।बस समझ लीजिए.. कानून आगे आगे ...मायावती पीछे पीछे।20 फरवरी 2011 को गाजियाबाद में मायावती के दौरे की कहानी जानना आपके लिए बेहद जरूरी इसलिए है कि इस जिले से मायावती खुद ताल्लुक रखती हैं।यहां तक तो ठीक है।लेकिन जब ताल्लुक के साफ्टवेयर से तेवर का हार्डवेयर जुड़ता है तो नौकरशाहों से लेकर नकली खैरख्वाहों तक की पैंट गिली हो जाती है।कुर्सी तो छोड़िए पतलून बचाने के लिए गाजियाबाद के
वाहियात अफसरों की फौज ने गरीबों की तमन्नाओं की तकदीर को कुचलने के लिए बेशर्मी की ऐसी कालीन बिछायी थी जिस पर मायावती का पैर पड़ते ही दलितों का कलेजा छलनी हो गया।सुबह जब गाजियाबाद के रघुनाथपुर गांव के लोगों की आंखे खुली तो सबसे पहले उनके आंखों की मुठभेड़ दरवाजे पर खड़ी शाही पल्टन से हुआ।कल तक थाने में नाक रगड़ने वाले दलितों की चौखट पर सांभा की तरह पुलिस पहरेदारी कर रही थी।एक एक घर कैदखाने में तब्दील हो गयी थी।समझ लिजिए हवा पर अख्तियार नहीं था वरना यूपी पुलिस तो सांसों पर भी पहरा लगा देती।25 किलोमीटर पर मानवाधिकार ऑफिस है।30 किलोमीटर पर सुप्रीम कोर्ट है।और थाना पुलिस की क्या बात करें।इन्हे तो पहले से ही गुंडागर्दी का लाइसेंस मिला हुआ है।बस इतना समझ लीजिए रघुनाथपुर की गलियों में खाकी जुर्म के मुहावरे बदल रही थी।20 फरवरी को रविवार का दिन था।लेकिन मायावती के आने की खबर लगते ही डीएम से लेकर एसपी तक बच्चों को स्कूल पहुंचाने में लगे रहे।नये नये ड्रेस में ए बी सी डी पढ़ने वाले बच्चे क्या जाने आज क्या तूफान आने वाला है।लेकिन स्कूल के प्रिंसिपल से जब पूछा गया आज तो रविवार है।तो प्रिंसिपल साहब का हलक सूख गया।हाथों के तोता,मैना,कबूतर,कोयल सब उड़ गये।मायावती अस्पताल पहुंची...वहां भी खेल हो चुका था।पता नहीं मरीजों को कम्बल नसीब होता कि नहीं...लेकिन रविवार को सूबे के डॉक्टर के आने की
खबर मिलते ही मरीजों की मौज हो गयी।
मायावती एक वार्ड में भर्ती मरीजों से पूछीं डॉक्टर आते हैं कि नहीं...तो कम्बल के नीचे से आवाज आती है....आते हैं।तहसील पहुंचती है...वहां भी पाप पुण्य का लेखा जेखा।अपनी हनक से तात्पर्य और निस्तारण के बीच अफसरों की औकात को धूल की तरह झाड़ दी।माया के गुमान की आंधी में सुशासन की चादर तिनके की तरह उड़ गयी।माया के हां में हां और ना में ना मिलाने का गुस्ताखी सौ बार करनी पड़े तो अफसरों की फौज कालिया की तरह करने को तैयार है।दौरे के दर्द से नौकरशाहों की निकली चीखों में सौदेबाजी की दुर्गंध आयी तो कहानी समझ में आने लगी। रजिस्टर चेक करने के लिए मायावती हैलिकाप्टर से दौरा कर रही हैं।नफा नुकसान की भनक लगते ही थोड़ी सी फटकार के बाद फटाफट वाला सिलसिला बरकरार रखने के लिए क्लास भी लगायीं।लेकिन राह चलते लगने वाले क्लास से जिले के मॉनिटरों में बदलाव आ जाता तो काफिले का रास्ता इंसाफ मांगने वाले नहीं रोकते लेकिन मायावती को कौन समझाए पत्थर और पैबंद का फर्क।उन्हे तो निर्जीव पत्थरों में ही सियासी चेतना दिखती है।कल्याणकारी अवधारणा दिखती है।सदभावना दिखती है।पता नहीं और क्या क्या दिखता है।फिलहाल इस मसले पर संसद से लेकर सड़कों तक खौफनाक सन्नाटा पसरा है। इस कहानी की हकीकत पर पूर्णविराम लगने से पहले सवाल ये है कि जब मायावती को यही तमाशा करना था तो फाइलें लखनऊ में क्यों नही मंगवा लेती।कम से कम खौफ में मर मर कर जीने की तकलीफ तो लोंगो को नहीं उठानी पड़ती।
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