Friday, May 27, 2011

ईटीवी :"चापलूसी " है सदा के लिए

जिज्ञासाएं थी, भावनाएं थी, आवारगी और किरदार था।मुट्ठी में तहजीब की दौलत थी और सीने में खौलते जज्बात।हर चीज को तर्क की आंच पर पकाने की जिद।दिमाग में दुनियाभर की बातें घुमड़ रही थी तभी अचानक ब्रेक लगी और कंडक्टर ने आवाज दी.....रामू जी फिल्मसिटी दिगंडी यानी उतर जाओ।मैं बस से उतर कर रामूजी फिल्मसिटी गेट पर पहुंचा वहां तैनात एक गार्ड से पूछा ईटीवी ऑफिस कहां है।आवाज आयी....अभी बस आएगी।दस मिनट बाद एक बस आती है.कर्मचारीयों से भरी बस में मैं खड़ा होकर 15 मिनट की सफर के बाद ईटीवी के एचआर बिल्डिंग में पहुंचा।17 मई 2008 को दामाद की तरह खातिरदारी पहली और आखिरी बार थी।ज्वाइन करने के बाद मुझे रहने के लिए सहारा छाप होटल के जनरल वार्ड में एक ब्लू फिल्म वाली बेड राष्ट्रीय एहसान के तौर पर सौंपा गया।अगले दिन मेरी नाइट ड्यूटी थी।साथियों से परिचय हुआ....,दोस्ती हुई और दरियादिली की दास्तान बनती गयी।कभी शिफ्ट में जिंदगी तो कभी जिंदगी में शिफ्ट।एक एक दिन बीतता गया।जिंदगी आइसक्रीम की तरह पिघलने लगी।जिसे "चाटने" के लिए बड़े बड़ों की एक जमात को अधिकारिक "लाइसेंस" दी गयी थी।काश ये "परंपरा " पहले होती तो लार्ड डलहौजी इससे कबका निपट चुका होता।लेकिन बड़े बड़ों की जमात ने तो कर्मचारीयों के आत्मसम्मान को रौंदने की परंपरा को "पर्व" बना लिया।जो बच गए वो जुबानी तेल लगाने में सचिन तेदुलकर से आगे निकल गए।"वक्त के धुंध में कईयों की तस्वीरें साफ हुई तो कईयों के चेहरे निगेटिव बन चुके थे"।अब इनके नाम गांव बताके भाव क्या बढाना....अभी तो तमाशा चालू हुआ है।बस देखते जाइए।हैदराबाद के ईटीवी ऑफिस में छुट्टी लेने के लिए कर्माचारीयों को बड़े बड़ों की जमात से वैचारिक एनकाउंटर करना पड़ता था।जिसने छुट्टी के लिए खिलाफत का बिगुल फूंका....हुक्मरानों के नफासत के शिकार बन गए।जो बच गए....उनकी "किस्मत " रोस्टर में "चमकने" लगी।जी हुजूरी ब्रिगेड बिछने के लिए एनएसजी कमाडों की तरह तैयार रहती।थकी हुई शब्दावली से मोर्चा संभाले जी हुजूरी ब्रिगेड से जब तथाकथित जमात का मन भर गया तो कांडोम की तरह निकाल कर फेंक दिया।गुनाह है....पाप है...फरेब है साहब।लेकिन साहब की "अकड़" तो इसी गुस्ताखी में पत्रकारिता से विश्वासघात करती गयी।गुमान में जीने का चस्का चेहरे से नूर की तरह टपक रही थी।तानाशाही जमात ने "सपनों की भ्रूणहत्या" करने के लिए "हुक्म की बर्छी" का बेरहमी से इस्तेमाल किया।"सुनाने" का बदचलन तो आयी- गयी हो गयी।लेकिन इस पौराणिक बदचलन से मौलिकता ऐसे झलकती है जैसे पुलित्जर पुरस्कार देने का पैमाना इन्होंने ही बनाया है।इस शर्मनाक अफसोस पर तालियां बजाकर हम इनके बातों को तवज्जो देते गए।इसलिए नहीं की हम मजबूर थे इसलिए की इनकी काहिलियत से मुझे आत्मबल मिलता था।जो मेरे मंजिल के रास्ते में "तरक्की के पदचिन्हों " को और गहरी करती गयी।सप्ताह बीता,महीना बीता,एक साल बीता,दो साल और फिर तीन साल बीत गया।तीन सालों के सफऱ में बहुत से दोस्त बने, बहुत से अपने बने।लेकिन हमारे शर्ट का बटन जिंदगीभर लगाने वाली कोई नहीं दिखी।कोई ऐसा नहीं मिला जिसके कंधों पर सिर रखके सो सकूं। कोई ऐसा नहीं मिला जिससे मैं अपनी तकलीफें साझा कर सकूं।कैसे मिलेंगे....जब सभी ईटीवियन्स(कुछ अपवाद को छोड़कर) अपने जिंदगी के सबसे यादगार हिस्से पर गर्व करने के बजाय चापलूसी के पहाड़ में स्वार्थों की सुराख बनाने में लगे थे।पता नहीं वो कहां तक पहुंचे।लेकिन मैं जानता हूं हैदराबाद के हरियाली में घुली घुटन के उस माहौल को....जिसमें हमने जिंदगी के उस अनुभवों को हासिल किया जिसे पाने के लिए ना जाने कितने लोग सड़कों पर लोग "सुबह को शाम" और "शाम को सुबह " बनाने में जिंदादिली का इम्तेहान देते हैं।"मैं अपनी इन अनमोल यादों को अतीत से मुक्त करके उत्सव के आसमान में स्थापित कर दिया है।इसी आसमान का एक टुकड़ा(तमाशा चालू है) आज बरस रहा है"।और आखिरी में सबसे खास बात।हैदराबाद का सूरज जैसे ही शाम होते पश्चिम की करवट लेता मन की तहों में खलबली मच जाती थी।कल फिर ऑफिस आना है...जाना है...खाना है।लेकिन जब 17 मई2011 का सूरज जैसे जैसे पश्चिम की ओर करवट ले रहा था तो दिल जोर से धड़क रहा था।की-बोर्ड पर हाथ काम नहीं कर रहे थे।जुबान साथ नहीं दे रहा था।पैर लड़खड़ा रही थी।सांसे तेज चल रही थी।रफ्ता रफ्ता शाम बीता, रात हुई।दस बजा,ग्यारह बजा और जैसे ही घड़ी में बारह बजा मैंने पंच मशीन पर अंगुली रखा तो जैसे ही पीं की आवाज आयी....वैसे ही मेरे शरीर में एक अलग हरकत हुई ।ये हरकत थी...उस बेचैनी के खत्म होने की।ये हरकत थी...पैरों के तेज चलने की।ये हरकत थी....हाथों का साथ मिलने की।ये हरकत थी...शर्मायी सांसों के चलने की।ये हरकत थी....भ्रमजाल के टूटने की।ये हरकत थी....ख्यालों के आजाद होने की।यानी ईटीवी में घुटन के तीन साल के जिस अनुबंध से मेरी सांसे "निर्वासन" के लिए तड़प रहा था।वो अब "स्थापन " के लिए दम तोड़ेंगी।