बंदर
को नचाने से कलंदर नहीं बनते
और तस्वीर पर माला फिराने से
पैगम्बर नहीं बनते।लेकिन
"नीम
-
हकीम
खतरा-ए-
दिग्विजय
कैम्प से ही बूढ़े ("नाजायज
"
दत्त
तिवारी )
और
जवान (राहुल
गांधी )
जैसे
कांग्रेसियों को ताकत मिलती
थी"।भट्टा
पारसौल में "कायर
मर्दानगी दिखाने के लिए उधार
के टोटकों का सहारा लेने वाले
राहुल को इंसान की सेवा नहीं
राजतिलक पसंद है।राजतिलक की
भूख ने उनके अंदर की संवेदना
को खत्म कर दिया है"।भट्टा
पारसौल में जाकर माया राज के
खिलाफ जुल्म को महिलाओं के
बलात्कार से जोड़ने वाले राहुल
अपने निर्लज्ज सिद्धांतों
की सीढ़ी से इतना नीचे उतर
चुके हैं कि उपर चढ़ने के लिए
अब मंत्रियों का सहारा लेना
पड़ रहा है।कमाल
करते हैं राहुल गांधी...इनको
भट्टा पारसौल में मायाराज के
जुल्म दिखता है लेकिन असम
के कांग्रेस के राज में हुए
"साम्प्रजातीय
हिंसा"
नहीं
दिखता ।पचास से ज्यादा
लोगों की मौत हो गयी..लाखों
बेघर है।हाहाकार मचा है...कोई
किसी का नहीं सुन रहा है...जैसे
जी गए तो क्या मर गए तो क्या।मौतों
से बेपरवाह कांग्रेस के सांसद
युवराज के राजतिलक के लिए इतने
व्यस्त हैं कि सोनिया से
गिड़गिड़ा रहे हैं।राहुल ना
असम में भट्टा पारसौल छाप
गुपचुप दौरा करने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं और ना ही
उन्हें लिखी हुई संवेदना जताने
की फुर्सत है।"अगर
यही भाजपा शासित राज्यों में
होती तो कांग्रेस के साथ
हमबिस्तर होने वाली मीडिया
ऐसे पेश होती जैसे हरिश्चन्द्र
की आत्मा सीधे इन्ही में घुसी
है।गुजरात हिंसा के बाद मोदी
पर कांग्रेस की जुबानी हंटर
चलाने वालों की हलक सूख गयी
है।नैतिक शिक्षा की निजी
मान्यता कूटने वालों की ना
सफाई निकल रही है ना दुहाई
..ऐसे
मौके पर बीजेपी की खामोशी ने
उसके "उपलब्धियों के अनुभवशास्त्र"
पर "सियासी नादानी" का ऐसा धब्बा
लगा दिया है जिसे सिर्फ
येदियुरप्पा और मोदी जैसे
नेता ही धो सकते हैं"।बाबरी
मस्जिद पर लगा ताला खुल सकता
है...
सीलिंग
का ताला खुल सकता है...लेकिन
राहुल के जुबान का ताला नहीं
खुल सकता.....आप
करते रहिए...खुल
जा सिम सिम।"जलते
असम के आगे राजनीतिक दलों की
खामोशी उनके आत्मसमर्पण की
घोषणा है।जाति और धर्म के
सामने सभी दल बेबस हैं।बदलाव
के बिगुल पर बट्टेदारी के
बिना सिद्धांत भी सिरदर्द
लगते हैं।फायदा ,राजनीतिक
रवायतों का अंतिम सच है"।..असम
में आग लगी है...कांग्रेस
की सरकार है...मनमोहन
सिंह गुवाहाटी से राज्यसभा
सांसद हैं।हिंसा के तांडव के
आठ दिन बीतने
के बाद यानी 29
जुलाई
को "संता
क्लाज "
की
तरह गुमनाम रहने वाले मनमोहन
सिंह "अचानक
अतिउत्तेजित "
होकर
असम का दौरा किए। और कोकराझार
कांड को देश का कलंक बताकर300
करोड़
का पैकेज थमा दिए।"इस
पैकेज ने तरूण गोगोई को देश
के लिए सम्मानीय बना दिया
...पैगम्बर
बना दिया।ठीक वैसे ही जैसे
सरकार ने "जिम्मेदारी
"
से
एंडर्सन और क्वात्रोची को सम्मानीय बनाया था"।आर्थिक
पैकेज का सुगंध मिलते ही कठोर
से कठोर लोगों का दिल पिघल
जाता है...फिर
जाति क्या धर्म क्या।असम के
कोकराझार में हिंसा की पहली
चिनगारी फूटी 6
जुलाई
को...जब
ऑल बोडोलैंड माइनॉरिटी स्टूडेंट
यूनियन के दो सदस्यों को अज्ञात
लोगों ने अंथिरपारा में मार
डाला।इसके बाद 19
जुलाई
को इसी संगठन के पूर्व अध्यक्ष
और उसके सहयोगी का मागुरमारी
में कत्ल कर दिया गया।जिसके
अगले ही दिन भीड़ ने बोडो
लिबरेशन फ्रंट के चार सदस्यों
की हत्या कर दी और बोडो के
ओंथाईबाड़ी के एक पुराने मंदिर
को आग के हवाले कर दिया गया।और
इसके बाद से हालात बिगड़ते
चले गए।धीरे धीरे ये कत्लेआम
कोकराझार से धुबरी और धुबरी
से चिरांग पहुंच गयी।नफरतों
की नागफनी इंसानियत की कब्रिस्तान
पर उगते देख हजारों गांववाले
अपनी हसरतों को ड्योढ़ी पर
छोड़कर जाना पड़ा।दर्द के
सोखते में आंसूओं का समन्दर
सूख गया।गांव वाले जिंदा हैं
तो महज इत्तेफाक है।"सवाल
ये है कि अगर आठ दिन बाद भी 300
करोड़
के पैकेज तक ही पहुंचना था तो
मनमोहन सिंह ने ये "कमाल
"पहले
दिन ही क्यों नहीं दिखा दिया।हम
पूछेंगे कसूरवार कौन है आप
कहेंगे गोगोई सरकार ...हम
कहेंगे क्या "एक
गोगोई सरकार "
का
सवाल है"।
Saturday, July 28, 2012
Wednesday, July 18, 2012
अच्छा...तो हम चलते हैं
इतिहास अपने दौर के नायकों का मकाम देखती है...."समय का सांचा जब आनंद के बिना हिंदुस्तान को परखेगा तो इस बात का एहसास होगा कि जिंदगी से ज्यादा मौत का सफऱ सुहाना होता है ना कोई छोर ना कोई चिंता"....चांद तारों से चलना है आगे...आसमानों से बढ़ना है आगे....पीछे रह जाएगा ये जमाना ...यहां कल क्या हो किसने जाना...तब राजेश खन्ना के किरदार की मौत हुई थी.....अब उस किरदार को किंवदती बनाने वाले आनंद की मौत हुई है...मौत से कुछ और मिले ना मिले...जिंदगी से तो जान छुटेगी ..मौत कभी भी मिल सकती है जीवन कल नहीं मिलेगा..."अभिनय के द्वीप" राजेश खन्ना का जाना एक युग का गुजर जाना है।इस वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि अविश्वसनीय विरोधो से भरे जीवन में "ईगो" को अपनी अदाओं से रोमांच में तब्दील करने का तजुर्बा, सांसों से मल्लयुद्ध में हार गया"। उनके अभिनय में जो बंजारापन था वो चारवाहा से लेकर उस्तादों की दिल जीत लेती थी...काका की अदाएं दिलों में फूलों की बर्छी की तरह लगती थी।"काका ने कला को काल की परिधियों से आजाद करके अभिनय के उस शिखर पर स्थापित कर दिया है जिसे छुने के लिए "आनंद" बनना पड़ेगा"....
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