Saturday, July 30, 2011

वन्स अपॉन ए टाइम इन "बीजेपी"

सुना था शरीर से निकला प्राण,कमान से निकली तीर और जुबान से निकली बात कभी वापस नहीं आती।पहले दो का तो पता नहीं लेकिन तीसरे को येदियुरप्पा ने साबित कर दिया।बकायदा प्रूफ है येदियुरप्पा के श्रीमुख से निकली बात।ग्रह नक्षत्रों की चाल ....कर्क और मकर रेखा की ढाल ....और चांद , सूरज और पृथ्वी की लेटेस्ट स्टेटस। उपर से यजमानों का आशीर्वाद।गद्दी बचाने के लिए इतना "इंतजाम" किया था येदियुरप्पा

ने ।लेकिन तकदीर के सितारे सूरज बन जाते तो बात ही क्या।किसी ज्योतिष ने येदियुरप्पा को बताया था कि अपने नाम में एक "डी" और बढा दें तो किस्मत के सितारे जगमगा उठेंगे।"सियासी जादू -टोने " से तंग येदिदुरप्पा ने एक "D "बढ़ा दिया...सोचा उनका प्रताप मगध नरेश की तरह दसों दिशाओं में फैल जाएगा ।लेकिन ये भूल गए कि नाम से किस्मत बदलती तो राजा जेल में नहीं होते।कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट ने येदियुरप्पा के किस्मत की सारी वर्जनाएं तोड़ कर रख दी हैं।बीजेपी के लिए येदियुरप्पा रिपोर्ट के आने से पहले दूध के धूले थे।लेकिन अवैध खनन की रिपोर्ट में येदियुरप्पा का नाम आते ही बीजेपी के पेट में मरोड़ उठने लगी।चाल,चरित्र और चिंतन की खाल उतरते देख बीजेपी ने येदियुरप्पा को गद्दी छोड़ने का फरमान सुना दिया।यहां तक तो सबकुछ ठीक था।









































लेकिन "दागियों के देवता को सावन का पहला चांद देखकर कुर्सी छोड़ने की जिद बीजेपी के बुजुर्गों को भारी पड़ गयी। इस शुभ मूहूर्त के एक एक पल में बीजेपी की सियासी तबियत बिगड़ रही थी और येदियुरप्पा बीजेपी को "कंधा "देने के लिए विधायकों का इंतजाम कर रहे थे ""दीन दयाल उपाध्याय की आत्मा इस "त्यागराज "पर सौ बार मरी होगी "।इसे ही कहते हैं कायान्तरण "। बगावत का खूंखार चेहरा देखते ही बीजेपी को समझ में आ गया कि "अब जाकर कीचड़ में पूरा कमल खिला "है।दिलेर येदियुरप्पा की हिम्मत देखकर बीजेपी की जुबान को लकवा मार गया।29 जुलाई 2011की शाम होते होते बीजेपी के इस "थॉमस" ने शर्तों की ऐसी प्रस्तावना रख दी जिसे पढते ही बीजेपी के दिमाग के दरवाजे झनझना गए ।येदियुरप्पा ने कहा मैं इस्तीफा तभी दूंगा जब मुझे कर्नाटक बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाएगा और मुख्यमंत्री उसे बनाया जाए जिसे मैं कहूंगा। "खड़ाऊंवाद " पर उतरे येदियुरप्पा ने सीधे कहा नये मुख्यमंत्री के मंत्रिमंडल में मोहरे भी भी वही होंगे जिसे मैं चाहूंगा।मतलब "डॉयरेक्टर भी वही ,निर्माता भी वही और कलाकार भी वही "।सकल गुण निधानम, वानरानाम धीसम....रघुपति प्रिय भक्तम,वातात्म्जामि।

अनर्थ पर बीजेपी के हाथ पांव फूल गए।चरित्र और चेहरे के दो किनारों के बीच भारतीय राजनीति का भविष्य डूब रहा था और बीजेपी , "निर्वाण और मोक्ष के संस्कारों" में उलझी थी।क्योंकि बीजेपी के पास येदियुरप्पा के खिलाफ जाने की ना हालत है ना हिम्मत । बीजेपी के पास येदियुरप्पा से ज्यादा बेशर्मी की अनिवार्य सत्ता को स्थापित होने से रोकने की चुनौती थी।राजनाथ सिंह और अरूण जेटली जैसे सूरमा इस "जुर्रत " से निपटने के लिए बैंग्लोर गए थे। लेकिन जब खदानों के खलीफा से सामना हुआ तो संवाद और विवाद के बीच सूरमाओं ने तख्तोताज को ही दांव पर लगा दिया।कहा कोई शर्त नहीं कोई तर्क नहीं....येदिय़ुरप्पा गद्दी छोड़े नहीं तो बीजेपी कर्नाटक की गद्दी गंवाने को तैयार है।इस हनक से भी येदियुरप्पा की हेकड़ी ढीली नहीं हुई।


30 जुलाई 2011की शाम होते होते येदियुरप्पा ने फिर दोहराया.... सावन का पहला चांद देखकर इस्तीफा नहीं दिया तो गजब हो जाएगा।खैर दो दिन इस्तीफा के लिए बीजेपी को तरसाने वाले येदियुरप्पा ने बता दिया कि उन्हे बीजेपी पर कम ज्योतिष पर ज्यादा भरोसा था।अविश्वसनीय विरोधों से भरा शिकारीपुर के इस शिकार को 31 जुलाई 2011 के दिन बीजेपी के आत्मसम्मान को रौंदने के लिए याद किया जाएगा ।चाल चरित्र और चिंतन की बात करने वाली बीजेपी पराजय को दौर में पांखड से पीछा नहीं छुड़ा पा रही है।पीछा कैसे छुटेगी....खुद बीजेपी ने "सिद्धातों की नसबंदी " करके येदियुरप्पा को निर्लज्जता के उस "शिखर " पर स्थापित कर दिया है जहां पहुंचने के लिए कांग्रेसी थॉमसों को अपना "रैंक "बढाना पड़ेगा

Saturday, July 23, 2011

बेशर्म नौकरशाह का "अमिट" वजूद

कामयाबी पचाना सबके बूते की बात नहीं होती।कामयाबी इंसान को महान बनाती है।बहुत ज्यादा दिन नहीं हुआ जब राजस्थान के एक जिले में एक डीएम का ट्रांन्सफर किया गया...तो डीएम के ट्रांसफर को रूकवाने के लिए वहां कि जनता सड़कों पर उतर आयी।इस डीएम ने कुर्सी पर नहीं दिलों पर राज किया था।इस नौकरशाह के प्रति जनता ने हमदर्दी का हिमालय खड़ा कर दिया।लेकिन सियासी आग को इसे पिघलाने में जरा भी वक्त नहीं लगा ।उस जिले का नाम है नागौर और उस डीएम का नाम है.मुग्धा सिन्हा।
























मैंने इस ना का जिक्र सलिए किया की......आगे जो कुछ आप पढ़ेगे...उससे उबलते जज्बातों पर काबू नहीं रख पाएंगे।छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में जूटमिल इलाके में गौरवपथ का निर्माण कराना था।लेकिन गरीबों का मकान गौरवपथ के निर्माण में आड़े आ रही थी।मकान गरीबों का था इसलिए अतिक्रमण के दायरे में लाकर उसकी "ठीक से मरम्मत"कर दी गयी।तस्वीरों में देख लिजिए पता चल जाएगा....गरीबी मुफ्त में क्यों बदनाम है।जिस घर के एक एक समान से रहने वालों की यादें जुड़ी थी।वो घर पल भर में जमींदोज हो गया।जिस घर की दीवारों से हर सुख और दुख बांटा वो दीवारें धराशायी हो गयी।जिस दहलीज पर गरीबी का परदा था वो खुलेआम हो गयी।जिंदगी लग जाती है एक मकान को घर बनाने में...यहां तबियत से तोड़ने की जिद थी।वक्त बीत गया लेकिन वक्त की तासीर नहीं बदली।याद करिए परदा कहानी को।ठीक वहीं मंजर जूटमिल में था।फर्क बस इतना है कहानी में गरीबी का परदा था..और यहां गरीबी पर परदा था।कल्याणकारी अवधारणा पर बुलडोजर चलवा कर अंत्येष्टि कर दी गयी।रायगढ़ प्रशासन ने पूरी ताकत झोकं दी थी इस बस्ती को उजाड़ने में...जय सियाराम ...जै जै सियाराम नीति-नियंताओं की मर्दानगी पर शक करने से पहले बस्ती के लोग कलेक्टर से बुलडोजर के शिष्टाचार की शिकायत करने पहुंचे।गरीबों की पैरवी करने हाउसिंग कमेटी के पूर्व डॉयरेक्टर रोशनलाल भी पहुंचे थे।डीएम का साक्षात दर्शन करके रोशनलाल ने बात रखी।रोशनलाल का कहना था कि तोड़े गए मकान नक्शा से बनावाया गया था।अगर नक्शा नगर निगम के अधिकारियों ने बनाया था तो उन्हे भी सजा मिलनी चाहिए।बस ये सुनते ही डीएम कटारिया की जुबान कटार बन गयी।सजा की मांग क्या कर दी जैसे डीएम से इस्तीफा मांग ली हो।बुजुर्ग रोशनलाल को भरे महफिल में गेटआउट बोल दिया।लेकिन दिलेर रोशनलाल भी डीएम को डपट पड़े।

कहा डीएम साहब कानून मत समझाइए।इतना सुनते ही डीएम बौखला गया।मर्यादा को सूली पर टांग कर आपा खो बैठे।निकल जाओ....अभी निकलो....निकलो ..निकलो ।इतने पर डीएम नहीं रूके... बॉडीगार्ड को बुलाने के लिए कई बार घंटी बजायी ...लेकिन कोई नहीं आया ।माहौल बिगड़ते देख खुद रोशनलाल कमरे से बाहर आ गए।"गुमान की परखनली में डीएम का जज्बात एसिड की तरह खौल रहा था"।घर तोड़ा अच्छा किया...भगा दिया अच्छा किया ...बेइज्जती किया वो भी अच्छा किया ...लेकिन डीएम साहब इंसाफ कहा हैं।आप को तो गेटआउट बोलने का "नेशनल परमिट " मिला है।आप की महानता का कोई जवाब नहीं है डीएम साहब ।धन्य है प्रभु और धन्य है आप की लीला।देख लिजिए ...इसी तरह निकम्मी नौकरशाही को सींचने के लिए अमित कटारिया को सरकार हजारों रूपए तनख्वाह देती
खैर...इसके बाद तो डीएम के खिलाफ रायगढ़ का जर्रा जर्रा खौल उठा।आवाज आयी.... इस डीएम का इलाज करो।सभी राजनीतिक दल सड़क पर उतर गए।मोर्चा खोल दिया गया।नारे बाजी होने लगी।मोमबत्ती बिग्रेड हाथ जलाने लगी।और पल भर में नायक से खलनायक बन गए..अमित कटारिया।इतिहास में अमर होने की कुछ बुनियादी शर्तें होती है जो अमित कटारिया में सिरे से गायब थी।ये भूल गए की कुर्सी से नहीं काम से किस्मत बदलती है।मुग्धा सिंन्हा जैसी डीएम विरले ही मिलेंगे जो सच के उजाले को साझा करने की हिम्मत दिखाते हैं।वरना अमिट कटारिया ने तो साबित कर दिया सत्ता में चाहे जो भी हो नीचे की मशीनरी का मिजाज आज भी पुरानी बदगुमानियों से ही संचालित होती है।रायगढ़ का जूटमिल तो बस एक सूचना है...जानकारी है।ये घटना आपके शहर में भी हो सकती है।अगर जूटमिल बस्ती में किसी माननीय का मकान होता तो क्या गौरवपथ का रास्ता बदल नहीं जाता।अगर डीएम से बात करने वाला कोई माननीय होता तो क्या डीएम "तोहफा कबूल "नहीं कराते।ये दो सवाल मैंने इसलिए उठाए....जब आप के शहर में अमिट काटरिया जैसे खलनायकों से पाला पड़े तो रायगढ़ की तरह ही उसे मुकम्मल जवाब मिले