Saturday, April 23, 2011

संजरपुर में "सेकुलरों" का "सर्तिया" इलाज होता है...

झक्क मार रहे "सरकारी सेकुलरों " को मोदी को गरियाने में जो "कृतज्ञता" हासिल होती है उसे हासिल करने में ना जाने कितनी बा.....गांधी के तलवे चाटने पड़ते। यही वजह है कि कांग्रेस में मोदी को "हाथोंहा " गरिया कर "परम पद" पाने की होड़ मची रहती है।हो सकता है आने वाले दिनों में "कांग्रे की सदस्यता के लि मोदी को गाली देने का तरीका अनिवार्य" हो। इसी "परंपरागत तरीके" पर तो दिग्विजय सिंह को "चाणक्य का तमगा" मिला है।जिसे सीडी के जरिए हथियाने के लिए अमर सिंह जैसे "अति दुर्लभ दलाल" घुसपैठियों की तरह आगे आए हैं।अमर सिंह की गिनती...किसमें होती है।बताना मुश्किल होगा।लेकिन इतना तय है कि जिस प्रजाति में गिनती होती होगी वो प्रजाति इस कलंक के बोझ से झुक गयी होगी।

पहले मुर्गी आई की पहले अंडा।इस सवाल का जवाब समझना अब जरूरी है।क्योंकि अब ये सवाल बदल गया है।मसलन,पहले अमर सिंह आए की पहले सीडी , कांग्रेस में कोई "एक आदर्श" है या "पूरी कांग्रेस आदर्श" है, पहले सोनिया हैं कि पहले कांग्रेस, दिग्विजय सिंह राहुल गाँधी के गुरू हैं या गांधी छाप कांग्रेस के चेले।ऐसे कुछ "राजनीतिक सूडोकू " है जिसे सुलझाना बाकी है।अन्ना छाप अनशन से भ्रष्टाचारियों की "सेहत" का ख्याल रखने के लिए नेता "जयचंद्रावतार" लेते रहेंगे।रही बात सेकुलरों की तो उनकी "कार्यक्षमता " पर सवाल उठा कर हम मोदी की तारीफ नहीं करना चाहते।नपुंसक सेकुलरों का इलाज करना बेहद जरूरी है। इस कटेगरी में वो सारे बक – दलाल ,धर्मपोंगु और विशिष्ट और अनंत का ज्ञान कराने वाले रोगी आते ही जिनका "इलाज"दिन में तीन बार मोदी जपने से ही होगा।वो अलग बात है की मोदी का नाम लेते ही "धर्म परिवर्तन " हो जाएगा दिग्विजय सिंह ने इस गुस्ताखी को कई बार किया है...इसलिए उन्हे "पवित्र " होने के लिए "सेकुलरों का मक्का आजमगढ़ " में मत्था टेकना पड़ा।लेकिन बिडंबना देखिए,दिग्विजय सिंह के पैर पड़ते ही संजरपुर भी "शर्मनिरपेक्ष " हो गया।दिग्विजय के काफीले पर उलेमा ए हिन्द ने काले झंडे दिखाए।और तो और उलेमा ए हिन्द ने घोषणा कर दी वो चुनावों में प्रत्याशी उतारेगी।दिग्विजय सिंह ने आजमगढ़ जाकर "बना बनाया खेल" बिगाड़ दिया"रूठे रब" को मनाने के लिए भोंदू युवराज ने आजमगढ़ का दौरा किया।लेकिन "कुछ हासिल " होने से पहले ही संजरपुर के लोगों ने खुदा हाफिज बोल दिया।यूपी का चुनाव आते देख दुर्योधन डिपार्टमेंट के डीलर दिग्विजय सिंह अब अन्ना के शरण में पहुंचे हैं। कहा कि अन्ना को भ्रष्टाचार से लड़ाई की शुरूआत यूपी से करनी चाहिए।जैसे आन्ध्र प्रदेश में "कांग्रेस का राम – राज " हो।वैसे अन्ना के "मासूम तजुर्बे "को धकियाने वाले अमर सिंह और दिग्विजय सिंह ही नहीं है।उनके आस पास कई ऐसे "तजुर्बे के दलाल" है जिनके वजह से वफादारी की परिभाषा बदल रही है।इनमें से एक है स्वामी अग्निवेश....जिनको नक्सलियों की दलाली करने के लिए एक मात्र "सरकारी लाइसेंस " आवंटित हैं। बाकी लोगों का नाम गांव बताके भाव क्या बढ़ाना।खुद्दारी का दम भरने वाले ऐसे ही "प्रतिभावान" लोगों से प्रतिशोध उतारने के लिए एक ऐसे सियासी पार्थ की जरूरत है जो इनको ठीक करे


Monday, April 18, 2011

जंतर-मंतर "छू"

जब भ्रष्टाचार का सीडीक हो तो समझ लिजिए अमर सिंह के श्रीमुख से कुतर्कों की धारा फूटने वाली है15/04/2011 को शांति भूषण को एक अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार ने सीडी का वाला दिया।कहा गया कि इस सीडी में शांति भूषण की अमर सिंह और मुलायम सिंह के बीच हुई बातचीत कैद है।










































शांति भूषण को ये साजिश लगी लिहाजा उन्होने स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज करा दी।गूगल पर सर्च कर लिजिएगा अमर सिंह के बयान के बाद शांति भूषण कितना सुर्खियों में थे।देश ने जज्बातों की दौलत जिस अन्ना पर लूटाय़ी थी वहीं अन्ना पहले ही बैठक में लूट गए।हुकूमत को हिलाने वाले हजारे एसी में बैठते ही जंतर का मंतर भूल गए।कहा गया कि की बिल के दायरे से मंत्री और जज बाहर रहेंगे।पता नहीं पहली बैठक में सियासत के भगोड़ों के सामने में अन्ना कितनी देर टिके होंगे।लेकिन इतना तो तय हैं कि एसी में उड़ने वाले गांधीवाद के विषाणु अन्ना के टोपी के रास्ते इरादों में घुल चुके हैं।सीडी से मची सनसनी का खुलासा हुआ तो पता चला सीडी के किरदार कोई और नहीं वहीं बाबर के कट्टर पुजारी अमर सिंह और मुलायम सिंह हैंप्रशांत ने कहा कि 2011 की सीडी में मुलायम सिंह की वही आवाज है जिस सीडी को उन्होने 2006 कोर्ट में जमा कराया था।2006 की सीडी में अमर सिंह और मुलायम सिंह के बीच बातचीत है।और उसी सीडी की मुलायम सिंह की आवाज इस सीडी से जोड़ा गया है। अगले दिन यानी 18/04/2011 को सपा के प्रवक्ता मोहन सिंह ने कहा कि मुलायम सिंह ने शांति भूषण से कभी बात नहीं की।ये तो रही अथ श्री सीडी कथा।अब आगे सुनिए।भष्टाचारियों की जमात को मैला की तरह ढ़ोने वाली कांग्रेस को अन्ना हजारे की कंपनी में शांति भूषण इसलिए चुभ रहे हैं, कि शांति भूषण ने ही 1975 में इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण का मोर्चा संभाला था।राजनारायण को जीत दिलायी थी।कोर्ट ने जब इंदिरा गांधी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाया तो देश में कोहराम मच गया था।फिर देश पर आपातकाल का कलंक लगा।खैर इतिहास में तो गूंगी गुड़िया के कई टोटके दर्ज है।लेकिन वर्तमान की बहरी गुड़िया ने तो टोटके को ही भारतीय राजनीति का मर्ज बना दिया।इसी मर्ज का फर्ज अदा करने के लिए अमर सिंह सीडी के सूरमा बन बैठे।जब कांग्रेस को अपने भ्रष्ट नेताओं पर पहरा लगाने की नौबत आते दिखी तो पहरेदार पर पंजा मारने के लिए सीडी को ही हथियार बना लिया,और उजड़े हुए रियासत के लूटे हुए सुल्तान अमर सिंह को शिंखडी।इसी सियासी शिखंडी की आड़ में सीडी की हथियार को शांति भूषण पर दे मारी।सोचा था शांति भूषण पर वार करेंगे तो अन्ना को चोट लगेगी।लेकिन अन्ना तो चौकन्ना निकले।कहा कि मैं किसी के ईमानदारी की गांरटी नहीं से सकता।अन्ना का ये बयान नहीं है बल्कि उन कांग्रेसियों को गाली है जिनके वफादारी की दुर्गंध कुत्ते भी नहीं बर्दाश्त कर पाते हैंअमर सिंह ने सोचा था कांग्रेस के लिए बक-दलाली करेंगे तो उनका प्रताप मगध नरेश की तरह दशों दिशाओं में फैल जाएगाये भूल गए की ग्रह नक्षत्रों की चाल, स्वार्थों की खाल और सीडी की ढाल से ईमानदारी को नहीं रोका जा सकता।अब तो कांग्रेस की जाल में बटेर की तरह फंस गए है अमर सिंह।जिसकी चीख पर आप सिर्फ शर्मनाक अफसोस कर सकते हैं।वरना समाजवाद के खाल में छिपे दलालों से सियासी सहवास करने में कांग्रेस अपनी झिझक कबकी छोड़ चुकी है।सवाल ये नहीं है कि सीडी का निर्माता और निर्देशक कौन है।सवाल ये भी नहीं है कि सीडी में क्या है।सवाल ये है कि सीडी के साथ भारतीय राजनीति कबसे घूमने लगी ।

Saturday, April 9, 2011

देश पुकारे,अन्ना हजारे...

तख्त बदल दो ताज बदल दो...बेइमानों का राज बदल दो।ये नारा समाजवाद के बुनियाद को मजबूत करने के लिए जेपी ने दिया थाजेपी एक ऐसे दौर का नाम है जिसके संघर्षों के अवशेषों को सोचकर नेता आज भी भावुक हो जाते हैं।जेपी जैसे अम होने के लिए नेताओं को खानदान की परखनली में नहीं आवाम के प्रयोगशाला में खरा उतरना होगा।क्योंकि आवाम के तर्क विश्वास की आंधी में हुकूमतों के हवामहल तिनके की तरह उड़ जाती है।




फिक्रों की बर्छी से भ्रष्टाचारियों को हलाल ने जब अन्ना जारे जंतर मंतर पहुंचे तो जनता भी बेचारगी की जकड़न को तोड़कर बाहर निकली।देखा 73 साल का बुजुर्ग देश के भविष्य के लिए भूख हड़ताल कर रहा है और हम घर में बैठकर कामेडी सर्कस पर ताली पीट रहे हैं5 अप्रैल 2011 को जब अन्ना निराहार अनशन पर बैठे तो सरकार ने भी नजरअंदाज कर दिया।5 मांगों को लेकर अन्ना अनशन पर बैठे थे।एक घंटा बीता...दो घंटा बीता...चार घंटा बीता...दस घंटा बीता...चौबीस घंटा बीता।चौबीस घंटा बीतते बीतते मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी एहसास हो गया था।






शहर दर शहर जुड़ते गए...लोगों में अन्ना को समर्थन देने की होड़ मच गयी।ऐसी हवा चली की सोई हुई जवानी भी अंगड़ाई लेने लगी।चल पड़ा मैसेज का दौर।ट्विटर और फेसबुक भी जज्बातों को झकझोकरने लगे।लगने लगे चौराहों पर नारे।उठने लगी बुलंद आवाजें....भ्रष्टाचारियों भारत छोड़ों


सरकार की सांसे हलक में अटक गयी।धड़कनें ऊपर नीचे होने लगी।जो सरकार गांधी जी की हमदर्द बनती थी उसे ही अहिंसा के औजार को झेलना पड़ा।दूसरे दिन खबर आती है।सरकार ने अन्ना की तीन मांगे मान ली है।अन्ना ने कहा कि जब तक सरकार उनकी पांचों मागों को नहीं मानती है.. तब तक वो निराहार अनशन करेंगे।इस पर पूरा देश बेचैन हो गया।क्या युवा क्या बूढ़े जिसे जहां जगह मिला....वहीं अनशन पर बैठ गया।एक एक पल में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की सांसे पैबस्त हो रही थी।कश्मीर से कन्याकुमारी तक गुस्से की लहर दौड़ रही थी।सरकार में खलबली मच गयी।उम्मीदों में आग लगाने की इंतजार किया जाने लगा।लगा जैसे आज का इंतजार...इतिहास का इम्तेहान ले रहा था8 अप्रैल 2011 को देर शाम अरविंद केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश ने सरकारी फैसले को बताया...तो पूरे देश भारत माता की जय से गूंज उठा।9 अप्रैल को जैसे ही नींबू पानी पीकर अन्ना ने अनशन तोड़ा...अन्ना देश के दूसरे गांधी बन चुके थे।ये जीत भारतीय राजनीति की कालजयी इतिहास बन गयी।अन्ना हजारे के 96 घटे के भूख हड़ताल ने हिन्दुस्तानी सियासत का इतिहास बदल दिया।सरकारी की सारी राजनीतिक अनुलोम विलोम फेल हो गयी।अन्ना की मांग पर जन लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी बनायी गयी।लेकिन ये लड़ाई अभी बाकी है।15 अगस्त तक सरकार कानून नहीं बनाती है तो फिर जंतर मंतर पर आंदोलन होगा।यानी अब खुला खेल फर्रूखाबादी बंद होगा।संयम के चौखट को बिना लांघे अन्ना ने अपने आत्मसम्मान के मीटर से सरकारी औकात को जूते की धूल की तरह झाड़ कर रख दिया।निर्लज्जता का अजायबघर बनी सरकार ने अन्ना को चार दिन भूखे रखा।चार दौर के बातचीत के बाद दानवीर कर्ण की फोटोकॉपी की बनी सरकार सहमति का एहसान जता रही थी।इंसान की उम्र.... उसकी सोच, उम्मीद और जज्बा से बड़ी नहीं हो सकती। युवा पीढ़ी को अन्ना की आवाज के पदचिन्हों पर चलते रहना है...जागते रहना है...जगाते रहना है... वरना सरकार तो भ्रष्टाचारियों के पैरों को धोकर पीने का संकोच तो कबका छोड़ चुकी है

Monday, April 4, 2011

ऐतिहासिक लम्हे के विश्वासघाती "चैंपियन्स"

जिस आईसीसी के अध्यक्ष को पत्रकारों को सम्मान देने कीमीज ना हो उसे हिन्दुस्ता के विश्व चैंपियन्स को गुमराह करने का अधिकार किसने दिया। हिन्दुस्तान के विश्व चैंपियन्स देखते रह गए और कस्टम के कर्मचारियों ने अपनी ईमानदारी तले विश्वकप ट्राफी को कुचल दिए।आईसीसी ने जो कुछ किया है उसे सुनेंगे तो खून खौल उठेगा।28 साल के मेहनत को मटियामेट करके रख दिया है।ऐसी घटनाएं परंपराओं का हिस्सा नहीं होती और ना ही योजनाएं बनायी जाती हैं।यू हीं नहीं कोई विश्व विजेता बन जाता है।इसके लिए भरोसे की भट्ठी में तपना पड़ता है।जज्बातों को जरूरत की परखनली में उबलते हुए दिखाना पड़ता है।भावनाओं के शेयर बाजार में भविष्य को दांव पर लगाना पड़ता है।तमन्नाओं की तीर निशाने पर चलानी पड़ती है।जुनून की हद से गुजरना पड़ता है।क्या कुछ नहीं किया हमारे दिलेर जांबाजों ने।पहले मगरूर कंगारूओ की टीम को पहले चोट किया फिर पाकिस्तान की धज्जियां उड़ायी।तब जाकर वानखेड़ें मैदान में श्रीलंका को रौंदने के लिए भारतीय टीम उतरी थी।एक एक गेंद के आगे देश का गुमान चल रहा था।एक एक शॉट पर भुजाएं फड़क रही थी।दिल के डैने बाज की तरह फड़फड़ाने लगे थे।उम्मीदों का उन्माद कहिए या उन्माद की उम्मीद।सांसे भारत में भी थमी थी और सांसे श्रीलंका में भी थमीं थी।एक एक पल चट्टान की तरह खिसक रही थी।वाकई ये मैच जज्बातों का था.. ये मैच जीवट का था... मैच हुनर का था.. ये मैच हौंसले का था।पलकें भी झपकने से इनकार कर दिया।लेकिन जैसे ही धोनी ने धमाके दार छक्का मारा।जज्बात दिल के दरवाजे तोड़ कर बाहर निकल पड़े।माफ किजिएगा हम ज्यादा जज्बाती हो गए...लेकिन क्या करे खुशी को संभाल नहीं पा रहे।मैच खत्म होते ही 11 खलनायक बन चुके थे और 11 विजयरथ पर सवार हो चुके थे।कभी ना खत्म होने वाली जश्न से देश सराबोर हो गया।जिस सचिन ने देश को 21 साल कंधे पर उठाया था उसी महानायक को पूरे खिलाड़ियों ने कंधे पर उठा लियाइतिहास रोज नहीं बनते।लेकिन ये भी सच है कि इतिहास बदलता है।2 अप्रैल का दिन दोनों मुल्कों के लिए बाकी 364 दिनों की तरह नहीं रहने वाली।इस दिन हमारे महानायकों ने निर्वासन से आगमन और आगमनसे स्थापन तक का सफर पूरा करके शून्य से संभावनों का नया क्षितिज खोला है।आईसीसी अध्यक्ष माननीय शरद पवार की संदिग्ध मुस्कान ने भी कई राज खोले है।मैदान में मुस्कुरा तो ऐसे रहे थे जैसे ये ही जीतकर आए हों।महंगाई से इतर कोई पूछता नहीं लिहाजा अपनी पूरी ताकत ऐसे लोगों को नीचा दिखाने में झोंक देते है जिसे उठाने में उनका कोई श्रेय ना हो।कहीं आते जाते भी नहीं....कैसे जाएंगे..इज्जत जो कम हो जाएगी।श्रीलंका से कप आ रहा था लेकिन मुम्बई के कस्टम विभाग के ईमानदार खिलाड़ियों ने कप को पहले ही मार लिया।सचिन,गंभीर,धोनी की सेना देखती रह गयी।45 करोड़ की टैक्स माफी किया था।इस माफी पर क्या मुजरा किया है पवार साहब।और राजीव शुक्ला दबी जुबान से सच बोल रहे है।121 करोड़ हिन्दुस्तानियों से विश्वासघात पर आईसीसी की सफाई में छिपी तिरस्कार की तीर से पूरे देश को आघात लगा है।सवाल ये है कि इस परंपरागत बेशर्मी का प्रतिरूप किसे माना जाए।

Friday, April 1, 2011

देख तमाशा चालू है...

सौ.-मोनिका मोहन्या,जबलपुर


तरकारी में आज भी आलू है

देख तमाशा चालू है...

भ्रष्ट सरकारों के किले खड़े हो गए

नेताओं को खबर नही

नौकरशाह पस्त हैं

जनता को लगी दस्त है

यहां सब गर्दा है सब बालू है

देख तमाशा चालू है ...


चीरहरण का मार्केट है

गलाकाटना सफलता का शॉटकट है

जेब में सब के राम है

घनचक्कर हुए घनश्याम हैं

शिव भूलें हैं तांडव

गायब महाभारत के पांडव हैं

पाखंड के जंगल में शेर कोई न

यहां सभी गीदड़,लोमड़ी और भालू हैं

देख तमाशा चालू है...


मोबाइल पर सब अवेलबल है

रिचार्ज का जुगाड़ हो ,माथे पर क्यों बल हो

देशभक्ति,स्वामीभक्ति हई पुरानी

ये जमाना है फैंन्स का

भारतमाता हुई पुरानी

अब तो छाई शीला की जवानी है

पैदा नहीं होते भगत सिंह,आजाद,गांधी

फ़ैशन और भौड़ेपन की आंधी है

एसएमएस सी हो गयी ज़िंदगी

फेसबुक पर हो रही जज्बातों की कुकिंग

ट्विटर, ऑर्कुट,जीमेल और मौजूद याहू है

देख तमाशा चालू है ...