तख्त बदल दो ताज बदल दो...बेइमानों का राज बदल दो।ये नारा समाजवाद के बुनियाद को मजबूत करने के लिए जेपी ने दिया था।जेपी एक ऐसे दौर का नाम है जिसके संघर्षों के अवशेषों को सोचकर नेता आज भी भावुक हो जाते हैं।जेपी जैसे अमर होने के लिए नेताओं को खानदान की परखनली में नहीं आवाम के प्रयोगशाला में खरा उतरना होगा।क्योंकि आवाम के तर्क विश्वास की आंधी में हुकूमतों के हवामहल तिनके की तरह उड़ जाती है।
फिक्रों की बर्छी से भ्रष्टाचारियों को हलाल करने जब अन्ना हजारे जंतर मंतर पहुंचे तो जनता भी बेचारगी की जकड़न को तोड़कर बाहर निकली।देखा 73 साल का बुजुर्ग देश के भविष्य के लिए भूख हड़ताल कर रहा है और हम घर में बैठकर कामेडी सर्कस पर ताली पीट रहे हैं।5 अप्रैल 2011 को जब अन्ना निराहार अनशन पर बैठे तो सरकार ने भी नजरअंदाज कर दिया।5 मांगों को लेकर अन्ना अनशन पर बैठे थे।एक घंटा बीता...दो घंटा बीता...चार घंटा बीता...दस घंटा बीता...चौबीस घंटा बीता।चौबीस घंटा बीतते बीतते मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी एहसास हो गया था।




शहर दर शहर जुड़ते गए...लोगों में अन्ना को समर्थन देने की होड़ मच गयी।ऐसी हवा चली की सोई हुई जवानी भी अंगड़ाई लेने लगी।चल पड़ा मैसेज का दौर।ट्विटर और फेसबुक भी जज्बातों को झकझोकरने लगे।लगने लगे चौराहों पर नारे।उठने लगी बुलंद आवाजें....भ्रष्टाचारियों भारत छोड़ों ।


सरकार की सांसे हलक में अटक गयी।धड़कनें ऊपर नीचे होने लगी।जो सरकार गांधी जी की हमदर्द बनती थी उसे ही अहिंसा के औजार को झेलना पड़ा।दूसरे दिन खबर आती है।सरकार ने अन्ना की तीन मांगे मान ली है।अन्ना ने कहा कि जब तक सरकार उनकी पांचों मागों को नहीं मानती है.. तब तक वो निराहार अनशन करेंगे।इस पर पूरा देश बेचैन हो गया।क्या युवा क्या बूढ़े जिसे जहां जगह मिला....वहीं अनशन पर बैठ गया।एक एक पल में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की सांसे पैबस्त हो रही थी।कश्मीर से कन्याकुमारी तक गुस्से की लहर दौड़ रही थी।सरकार में खलबली मच गयी।उम्मीदों में आग लगाने की इंतजार किया जाने लगा।लगा जैसे आज का इंतजार...इतिहास का इम्तेहान ले रहा था।8 अप्रैल 2011 को देर शाम अरविंद केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश ने सरकारी फैसले को बताया...तो पूरे देश भारत माता की जय से गूंज उठा।9 अप्रैल को जैसे ही नींबू पानी पीकर अन्ना ने अनशन तोड़ा...अन्ना देश के दूसरे गांधी बन चुके थे।ये जीत भारतीय राजनीति की कालजयी इतिहास बन गयी।अन्ना हजारे के 96 घटे के भूख हड़ताल ने हिन्दुस्तानी सियासत का इतिहास बदल दिया।सरकारी की सारी राजनीतिक अनुलोम विलोम फेल हो गयी।अन्ना की मांग पर जन लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी बनायी गयी।लेकिन ये लड़ाई अभी बाकी है।15 अगस्त तक सरकार कानून नहीं बनाती है तो फिर जंतर मंतर पर आंदोलन होगा।यानी अब खुला खेल फर्रूखाबादी बंद होगा।संयम के चौखट को बिना लांघे अन्ना ने अपने आत्मसम्मान के मीटर से सरकारी औकात को जूते की धूल की तरह झाड़ कर रख दिया।निर्लज्जता का अजायबघर बनी सरकार ने अन्ना को चार दिन भूखे रखा।चार दौर के बातचीत के बाद दानवीर कर्ण की फोटोकॉपी की बनी सरकार सहमति का एहसान जता रही थी।इंसान की उम्र.... उसकी सोच, उम्मीद और जज्बा से बड़ी नहीं हो सकती। युवा पीढ़ी को अन्ना की आवाज के पदचिन्हों पर चलते रहना है...जागते रहना है...जगाते रहना है... ।वरना सरकार तो भ्रष्टाचारियों के पैरों को धोकर पीने का संकोच तो कबका छोड़ चुकी है।



क्या अन्ना दूसरे गांधी साबित हुए हैं? एक सवाल यह भी है क्या देश में कोई भी बदलाव लाने के लिए हर बार गांधी या हजारे के देशव्यापी आंदोलन की जरूरत पड़ेगी? आखिर हमारी सरकारें इस दिशा में खुद पहल क्यों नहीं करतीं?
ReplyDeleteअन्ना हजारे समर्थक इसे आजादी की दूसरी लड़ाई की संज्ञा दे रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं। हजारे के समर्थन में वह लोग शामिल है, जिन्हें नक्सलियों का समर्थक भी माना जाता है...