Thursday, March 24, 2011

भारतीय राजनीति में "मन"हूसों का योगदान

इसे कहते हैं बहुमत में जल्दी बड़ा "जुर्माना "भारतीय राजनीति पर एहसान कहिए विकीलीक्स का जिसने जुर्माना को हर्जाना बना दिया।जिसे चुकाने में अब पीएम साहब खुद चुक रहे हैं। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ.....पीएम कह रहे है पता नहीं ।कॉमनवेल्थ घोटाला हुआ....पीएम कह रहे है पता नहीं।थॉमसकी अवैध नियुक्ति पर पीएम कह रहे है पता नहीं।14 वीं लोकसभा में विश्वा मत हासिल करने के दौरान सांसदों का खरीद फरोख्त हुआ....पीएम कह रहे है पता नहीं।जब कुछ पता नहीं है साहब तो पीएम बने रहने की मजबूरी क्या है।22 जुलाई 2008 को हुई सियासी हादसे का चश्मदीद आप से बड़ा कौन होगा।सरकार को कंधा देने की नौबत आ गयी थी।लेकिन....इंतजाम इतना पक्का था कि.....आप के श्रीमुख से निकली शायरी पर आपके सहयोगी दलों के नासमझों ने भी खूब ताली पिटी थी।अब तो विकिलीक्स के खुलासे से सियासी गलियारों में खलबली मच गयी।अजित कह रहे हैं हमारे सांसदों ने वोट नहीं दिया।मुलायम सिंह तो वोट देकर फंस गए।और लेफ्ट तो अमेरिका की मां की आंख में ही यकीन रखता है।पीएम साहब ...शर्म करो उस शक्तिबोध को जो इस फरेब को राजनीतिक आस्था में तब्दील करने के लिए जालिम बना रही है।इस अंधेरगर्दी पर विकीलीक्स का चाबुक ऐसा हिसाब लेगा किसी ने नहीं सोचा था।23मार्च 2011 को लोकसभा में सुषमा स्वराज ने मनमोहन सिंह पर बरस पड़ी।कहा जब कुछ पता नहीं है तो पीए क्यों बने हैं।सुषमा के पांच सवालों के चक्रव्यूह में यूपीए सरकार छटपटा रही थी।लेकिन जब-जब सरकार ने मुंह खोला तो यही निकला...यकीन करिए विश्वास मत के दौरान "मन" ठीक था ।आप इस संदिग्ध सच्चाई को स्वीकारिए या धिक्कारिए...लेकिन नकार नहीं सकते।ईमानदारी का ताजमहल के बजाय झूठ का पिरामिड खड़ी करने में जितनी दिलचस्पी पीएम साहब ले रहे है उससे भारतीय राजनीति के बुझे तकदीर के आकाशगंगा के सितारे जगमगाएंगे जरूर...लेकिन सिर्फ उजाले में


Friday, March 11, 2011

“जिम्मेदारी" से बना बेशर्मों का पैगम्बर...

पी जे थॉमस की खैरियत और सरकारी खातिरदारी के बीच सिर्फ नस्ल का फर्क है।ऐसी नस्ल जिसके रगों में सिर्फ गद्दारी का खून दौड़ता है।तभी तो थॉमस ने सरकार को छोड़ा...कुर्सी नहीं।कांग्रेस की गैरत पर तो थॉमस ने सरेराह थूक दिया।क्या करेगी कान्ग्रेस ...और क्या करेंगी सोनिया।सुप्रीम कोर्ट ने जब "देश के थानेदार" को थॉमस की थीसिस की प्रमाणिकता साबित करने को कहा तो बहानों की बर्छी से दलीलों की टहनियां खड़ी कर दी थॉमस के अतीत को कांग्रेस का सुनहरा भविष्य बताया।इतने पर भी सरकार को होश नहीं आया तो थॉमस की पीठ थपथपा दी।थॉमस की पता नहीं कौन सी खूबियां अच्छी लगी की थॉमस के दागी इतिहास का इनाम खुद सरकार ने अपनी दस्तखत से दिया।बशेर्मी की आसमान में नैतिकता का पतंग उड़ाने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त हुई तो पूरा देश इस गुमनाम नादानी पर स्तब्ध रह गया।विरोध की आंधी में जब इस नादानी से परदा हटा तो देश को गुमराह करने की साजिश बेनकाब हो गयी।सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करके सरकार को शर्मिंदगी के दलदल में धकेल दिया।एक दागी पर दया दिखाकर पीएम ने भगवान गौतम बुद्ध के उपदेश को गाली बना दिया है।जीवों पर दया करो...जैसी बातें करके गौतन बुद्ध मजह इतिहास का हिस्सा बने।लेकिन पीए की थॉमस पर दया करने की बात तो भ्रष्टाचार के सुंदर कांड की प्रस्तावना बन गयी है।दागी पर दया का मियाद ज्यादा नहीं होनी चाहिए....और यहां तो पीएम ने थॉमस को सतर्कता का सर्टिफिकेट ही थमा दिया।जर्रे को शहंशाह का नकाब लगते ही तानाशाही जमात की नींद उड़ गयी।थॉमस के मार्कशीट से चार्जशीट तक का सफर मासूम सरकार को नहीं मालूम था।लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने थॉमस की नियुक्ति को अवैध बताया तो बहानों की चमक, कालिख लगने लगी।थॉमस के मोह में मजबूर पीएम ने थॉमस के कुकर्मों की फाइल उठाने की जहमत नहीं उठायी।क्यों नहीं उठायी....इसका जवाब आया 08/03/11 को।राज्यसभा में पीएम ने कहा कि कार्मिक मंत्रालय की देखरेख में थॉमस की कुंडली बनाई गयी थी।जिसमें थॉमस के कुकर्मों का अनुभव शून्य बताया गया।।पीएम के श्रीमुख से निकली बात महाराष्ट्र सरकार के लिए सियासी विष बन गयी है।जिसे निगलने की नैतिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते।पीएम ने इस गलती पर जिम्मेदारी तो ले ली लेकिन इस जिम्मेदारी ने थॉमस को बेशर्मों का पैगम्बर बना दियाकांग्रेस सत्ता के शिखरपुरूषों के आचरण पर शर्मिन्दा हो या ना हो...लेकिन देश को बुहत बड़ा आघात लगा है।अतीत बहुत निर्लज्ज होता है पीएम साहब ।उसके चेहरे पर हिस्सेदारी और जिम्मेदारी का फर्क साफ दिखता है।कांग्रेस की इस कृत्रिम आदर्शवाद पर उसके सहयोगी दलों की खतरनाक चुप्पी थॉमस की महानता को बढ़ा रही है।

Thursday, March 3, 2011

किसानों के कत्लेआम का "पॉवर " ...

आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में 28 फरवरी 2011 को जो कुछ हुआ,उसे सुनेंगे तो आप सुलग जाएंगे ।आजाद भारत में रोंगटे खड़े कर देने वाले इस जघन्य हत्याकांड की गौरवगाथा लिखने के लिए आन्ध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने किसानों का कत्लेआम करवा दिया।सदियों से पहले इस देश को अंग्रेजों ने लूटा,पुर्तगालियों ने लूटा,डचों ने लूटा फिर मुगलों ने लूटा जो बच गया उसे कांग्रेस सरकार ने लूट लिया।मुहम्मद गजनवी,मुहम्मद गोरी और तैमूर लंग के खानदार की सियासी हवस को आन्ध्र प्रदेश के सीएम किरण रेड्डी आगे बढा रहे हैं ।विदेशी अताताईयों की बर्बरता भी किरण रेड्डी के बुलंद हौसले को देखकर शर्मिन्दा है।श्रीकाकुलम के काकरापल्ली गांव में ईस्ट कोस्ट एनर्जी प्रा.लि. अपनी थर्मल पॉवर प्लान्ट लगाने के लिए 30400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना चाहती है।जिसका 25 से अधिक गांवों ने विरोध किया।इस विरोध पर आन्ध्र सरकार ने मौत का इंसाफ किया है।30400 एकड़ जमीन कंपनियों के चंगुल से बचाने के लिए किसानों का जत्था वद्दीतन्द्रा गांव में चुपचाप अनशन कर रही थी।28 फरवरी 2011 को देखते ही देखते वद्दीतन्द्रा गांव जवानों की छावनी बन गयी।इस घेराव की भनक जैसे ही गांव वालों लगी उनका विरोध मुखर हो गया।जैसे ही जवानों को इशारा मिला....पूरे गांव को घेर कर किसानों पर गोलियां बरसाना शुरू कर दी।गांव वाले जिन्दा थे और जिन्दादिल भी।किसानों ने डंडा और पत्थर से मोर्चा संभाल लिया।पुलि पल्टन से आमना सामना होते ही भूखे-नंगे किसानों की जान पर बन आयी।कुछ तो मौत से पहले ही मर गए और कुछ मौत की पीठ पर सवार हो गए।जान की बाजी लगाकर किसानों ने खाकी के खैरख्वाहों को खदेड़ दिया।लेकिन सूबे की सरकार तो किसानों के कत्लेआम करने पर अमादा थी।झोक दी पूरी ताकत।इस जुल्म पर आस पास के किसान भी भड़क गए।सिंगूर,नन्दीग्राम,टप्पल,आगरा,मथुरा के बाद श्रीकाकुल में किसानों का विरोध मौत का पैगाम बन गयी।जज्बातों की आंधी में जुर्म के मुहावरे बदल गए।कायर शूरवीरों ने माहौल बेकाबू होते देख किसानों के सीने पर गोलिया बरसाने लगे।किसानों को बेमौत मरते देख गांव की महिलाओ को सूर्या और परिमला बनते देर नहीं लगी।हाथ में जो बर्तन,डंडा,पत्थर आया यमराज के ऐजेन्टों को दे मारा।भागने का मौका तो कायर खोजते है....यहां तो गोलियां खाने के लिए सीने को चौड़ा कर रहे थे।इस विश्वास से की जीते जी अपनी जमीन को कंपनी के हाथ नहीं लगने देंगे।और हुआ भी वही।लेकिन रोक लगने से पहले बारूद की आग घरों तक पहुंच गयी...झोपड़ियों और कच्चे मकानों में रहने वाले किसानों के घर धधक उठे।कागजात.कपड़ा,कैश, अनाज कुछ नहीं बचा।घायल किसान अपनी ही जमीन पर कराह रहे थे..तड़प रहे थे...तिलमिला रहे थे।और आन्ध्र प्रदेश की सरकार इस मातम के तोहफे को तमगा बनाकर कंपनी के गले में डाल दीवद्दीतन्द्रा गांव से निकली चिंगारी, सियासी गलियारों में आग लगा रही है।घटना के 24 घंटे बाद चन्द्रबाबू नायडु पहुंचते हैं।जैसे हमदर्दी का लाइसेंस सिर्फ नायडु के पास हो।ऐसा कोई नेता नहीं बचा जिसने दो मिनट का सियासी शोक ना रखा हो।अंहिसा के औजार पर लोभ और लाभ का ऐसा वार किया कि गांधी जी की आत्मा सौ बार मरी होगी।ये जानने के लिए की क्या एक कंपनी की जरूरतें जिंदगी से बड़ी हैं।निहत्थे किसानों के सीने पर गोली बारूद खाली कर कायर शूरवीर तो परमवीरचक्र के दावेदार ही बन गए।धैर्य रखें...जालिमों की जमात के इस जश्न पर एक और जलिया वाला बाग कांड करवट ले रहा है।