Thursday, December 20, 2018

नसीहरुद्दीन साहब....आप एक्टिंग कम 'ड्रामा' अधिक करते हैं

मेरा भारत महान है...सुषमा मैडम आप महान हैं....। ये 'अल्फाज' उस मां के हैं जिसका बेटा छह साल बाद 'पाकिस्तान' से वापस अपने 'वतन' लौटा है। 'हामिद' की मां 'फौजिया' की पथराई आंखों से 'टपक' रहे ममता के आंसूओं में घुले यह 'अल्फाज' शायद 'नसीरुद्दीन शाह' साहब के कानों को नहीं सुनाई दिया तभी तो बोल रहे हैं कि उनको 'भारत' में रहने पर 'डर' लग रहा है। 2019 के पहले 'असहिष्णुता गैंग' की तरफ से पहला 'प्रायोजित बयान' आ चुका है देखते हैं अगला नाम इस 'गैंग' में किसका जुड़ता है।
वैसे एक सलाह है, आप माउन्टेन ड्यू पिया करिए... क्योंकि डर के आगे जीत है।


Thursday, December 13, 2018

शिवराज ने मध्यप्रेदश को नहीं मध्यप्रदेश ने शिवराज को खोया है

जीत हार लोकतंत्र का तकाजा है! लेकिन, मध्यप्रदेश ने ऐसा नायक खो दिया है जिनका मूल्यांकन इतिहास करेगा।आज, जब नेता शब्द व्यंग्य का प्रतीक बन गया है, ऐसे में शिवराज सिंह चौहान जैसा ईमानदार नेता मिलना कठिन है! शिवराज ने मध्यप्रेदश को नहीं मध्यप्रदेश ने शिवराज को खोया है

Sunday, December 2, 2018



मोदी के 'चक्रवात' से 'फसल बर्बाद' होने के बाद मंच पर एकजुट 'गरीब किसान

Thursday, November 29, 2018

इस एंकर ने बाबरी मस्जिद बनवाने का ठेका लिया है...?

तस्वीर में दाएं तरफ दिख रहे शख्स को तो आप पहचानते ही होंगे। ये हैं सुमित अवस्थी। कहने के लिए बड़े नामी एंकर है। सूझ-बूझ रखते हैं और अपने को रसूखदार समझते हैं। 'हम तो पूछेंगे' में इतना पूछ लिया था कि चैनल ने ही इनको पूछना बंद कर दिया। इन दिनों बाबरी मस्जिद बनवाने का कीड़ा काटा हुआ है। इसलिए बाबरी के पैरोकार बनकर घूम रहे हैं। ABP NEWS पर 'राम सम्मेलन' में योगगुरु रामदेव से पूछ रहे थे बाबरी मस्जिद कहां बनेगी? अब इन्हें कौन बताए कि मुगल आक्रांता बाबर के नाम पर भारत में बाबरी मस्जिद के लिए क्यों स्थान दिया जाए? राम हमारे पूर्वज थे उनका मंदिर बनना चाहिए या बाबरी मस्जिद बनना चाहिए, क्या ये बात सुमित अवस्थी को नहीं पता है? क्या सुमित अवस्थी किसी शो में मौलवियों से मक्का में शिव मंदिर बनाने के लिए सवाल पूछने की हिमाकत दिखा सकते हैं?

केजरीवाल का कुचक्र

वाह रे केजरीवाल... बदला लेने का इससे अच्छा तरीका तो कुछ हो ही नहीं सकता है। सुना था तुम राजनीति बदलने आये थे, लेकिन मिर्ची का असर इस कदर होगा सोचा भी नहीं था। दिल्ली पुलिस से बदला लेने के लिए तुम्हारी सरपरस्ती में पल रहे ये 21 विधायकों वाली यह चिट्ठी तुम्हारी चिरकुटई की इंतेहा है। उन शहीद पुलिसकर्मियों ने तुम आपियों का क्या बिगाड़ा था जो उनके करोड़ों के मुआवजा को रोकने के लिए शीर्षासन कर रहे हो। एक तरफ तुम्हारे बिगड़ैल विधायक सोमनाथ भारती न्यूज चैनल पर महिला एंकर को धंधे पर बैठाने की बात करता है और दूसरी तरफ तुम्हारे विधायक चिट्ठी लिखकर शहीद परिवारों के मिलने वाले मुआवजा न मिले उसके लिए मुहिम चला रहे हैं। थोड़ी भी राजनीतिक शर्म बची हो तो अपनी इन हरकतों पर विराम लगा लो नहीं तो ये दिल्ली है अपने पर आ गयी तो मुह छुपाने के लिए जगह नहीं मिलेगी।
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ध्यान दें - आम आदमी पार्टी के विधायकों से अरविंद केजरीवाल ने एक चिट्ठी लिखवाई है जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि कार्य के दौरान शहीद होने पर जवानों और अधिकारियों के परिवार को जो 1 करोड़ रुपए का मुआवजा सरकार देती है, वो इन्हें न दिया जाए। इस चिट्ठी पर आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं।

ये मोह मोह के धागे....

जब वक्त फैसला करता है तो जिंदगी की वकालत कहां चलने वाली....वक्त ने हमारे लिए भी कुछ ऐसा ही इशारा किया..रामोजी फिल्मसिटी से रुखसती का वक्त आ गया । ETV ज्वाइन करने के लिए 2008 में पहली बार हैदराबाद आया था... पता नहीं था कैसा शहर है... लेकिन ये अनजान शहर कब जिंदगी का स्थाई पता बन गया ये पता ही नहीं चला। हर मुश्किल हालात में जिंदगी की मायूसी को चुंबक की तरह सोख लेता था। आज एक बनी बनाई दुनिया से नाता टूट रहा था...बिछुड़ने की बेला में खुद को तैयार करना बहुत मुश्किल हो रहा था..जिस शहर में 10 साल रहा उस शहर में आज आखिरी दिन था...आखिरी बार ऑफिस गए। सब लोग वही थे... लेकिन मैं वहां होके भी नहीं था। कुछ मिल गए... कुछ छूट गए। आखिरी बार रोस्टर देखा... फिर सबका अभिवादन किया... कैंटीन से गुजरते हुए... सिक्योरिटी वाले को सलाम ठोकते हुए... बस में आकर बैठ गया... बस चल दी पेड़, पर्वत, नजारे देखते-देखते मोह के बंधन में कैद 10 साल की यादों का सावन बरसता चला गया... इसी उधेड़बुन में जैसे ही रामोजी फिल्मसिटी गेट से बस निकली.... आंखें भर गई थीं। पीछे मुड़-मुड़ कर देखता रहा। जैसे आज कोई आत्मा देह से निकल रही थी। रामोजी सर को सलाम किया...रामोजी जैसे इंसान दुनिया में बिरले मिलेंगे। हम भी उन हजारों लोगों में से थे जिनको रामोजी सर की छत्रछाया में प्रगति करने का मौका मिला। माइक्रो मैनेजमेंट के जादूगर रामोजी सर को नमन करते हैं । रामोजी के बस से आखिरी बार भाग्यलता तक का सफऱ किया । अगले दिन सुबह मुझे सिकन्दराबाद स्टेशन जाना था... मैं भाग्यलता बस स्टैंड पहुंचा... 290 नंबर की बस का इंतजार था...यही वो बस है जो मुझे घर पहुंचाने के लिए दूर से पहचान लेती थी... हमेशा की तरह कंडक्टर ने पूछा..टिकट- टिकट... मैंने बोला सिकंदराबाद। आखिरी बार सिकंदराबाद जा रहे थे... रास्ते में सबकुछ याद आ रहा था... वो NTR गार्डन...वो कोट्टी... वो एबिड्स... वो पंजा गुट्टा... वो हाईटेक सिटी... वो दिलसुखनगर, वो एलबी नगर, वो हयात नगर... वो वनस्थलीपुरम... वो सोहन टी स्टाल की चाय...मेरा फेवरिट रामाकृष्णा ग्लिटरेटी थिएटर ....ना जाने कितने ऐसे जगह हैं जो हमेशा के लिए मुस्कुराने की वजह बन गए। सोचते-देखते...सिकंदराबाद स्टेशन पहुंचे... 1 घंटे के इंतजार के बाद प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर सुपरफास्ट एक्सप्रेस दानापुर सिकंदराबाद आई... ट्रेन में सामान रखा...दिल धड़क रहा था... सबकुछ फिल्म की तरह दिमाग में घूम रहा था। इसी बीच हल्की सी हरकत हुई ... ट्रेन चल चुकी थी.. खिड़की खोली.. आंखें भर गई थी...जिस शहर ने मेरी 'आंखें खोली' थी उसी आंखों से शहर को 'देखता' चला गया । इन अनमोल यादों को लेकर एक मुसाफिर की तरह....मैं जिंदगी के 'अगले स्टेशन' की ओर बढ़ गया । अलविदा हैदराबाद
(कुछ शुभ चिंतकोंं की यादों ने आज स्पर्श किया )

...जब योगी सरकार में हुआ 'चमत्कार

एक जमाना था जब हमारे मऊ जिले के कोपागंज कस्बे में ट्रांसफार्मर जल जाता था तो उसे बदलने में कम से कम 2 सप्ताह इंतजार करना पड़ता था। पता ही नहीं चलता था...ट्रांसफार्मर कहां से आता था...कब आता था...कैसे आता था...और कौन लाता था । ट्रांसफार्मर बदलने के लिए कम से कम 5 दिन तक तो चंदा एकट्ठा किया जाता था। जिसे बिजली विभाग के अधिकारियों को कुर्सी से 'हिलने' के लिए दिया जाता था । मजाल देखिए... चंदा लेने के बाद भी ट्रांसफार्मर आने की पक्की तारीख नहीं बताते थे । भागा- दौड़ी के बाद ट्रांसफार्मर आने की सूचना आने में 3 दिन लग जाता था । हमारे चंदनपुरा मोहल्ले में इतनी सरगर्मी किसी के घर दुल्हन आने पर भी नहीं होती थी जितना ट्रांसफार्मर आने पर । खैर, हील हुज्जत के बाद ट्रांसफार्मर आने के इंतजार में हर मिनट बेसब्री से गुजरता था । अब लाइट आई...तब लाइट आई । इसी अफनाहट में एक दिन और बीत जाता था । फिर पता चलता था ट्रांसफार्मर में अभी तार जोड़ना है । उसमें भी एक दिन लग जाता था। तार जुड़ने की खबर मिलते ही घरों में सारे स्विच ऑन हो जाते थे.. आज लाइट से मुलाकात होने वाली है । लेकिन दिन के बाद रात हो जाती थी और रात भी बिना लाइट के निकल जाती थी । अगले दिन सुबह पता चलता था ट्रांसफार्मर में तेल डालकर गर्म करना होता है उसमें भी एक दिन लगेगा । तेल डालने के बाद लोगों की नजरें बल्ब और ट्यूबलाइट पर होती थी...इंतजार में दिन बीत जाता था...धीरे धीरे रात हो जाती थी..लोग सोने की तैयारी करते थे...तभी भक्क से लाइट आती थी...अगले दिन क्या क्या करना है कैसेट की तरह दिमाग चलने लगता था। पूरे कोपागंज में पावरलूम, टीवी, मोटर, चक्की सब चालू हो जाता था । ये जमाना अभी अखिलेश सरकार तक था। जमाने से जमी हुई इस 'खूंखार' सच्चाई से 10 दिसंबर को कोपागंज का एक बार फिर पाला पड़ा । 7 ट्रांसफार्मर एक साथ जल गए । पूरे कोपांगज में हाहाकार मच गया था । लेकिन इस बार लोग लाइट नहीं....योगी सरकार की नियति देखना चाहते थे । क्योंकि योगी सरकार ने वादा किया था जले हुए ट्रांसफार्मर 48 घंटे में बदले जाएंगे । हुआ भी वही । 48 घंटे में 7 ट्रांसफार्मर एक साथ बदले गए । 13 दिसंबर को लाइट आ गई । इस 'चमत्कार' को देखने वालों को यकीन हो गया उन्होंने जिस 'अंधेरे' और 'अंधेरगर्दी' को दूर करने के लिए बीजेपी को वोट दिया था वो सफल हो गया ।

सियासत@खुद्दारी पर भारी खुदगर्जी

भोपाल के रोशनपुरा झुग्गी बस्ती में रहने वाला 'कौशल शाक्य' इन दिनों फिर चर्चा में हैं। पहली बार कौशल उस समय चर्चा में आया, जब वह सड़कों पर अखबार बेचते हुए भोपाल में 'राहुल गांधी' से मिला था। राहुल गांधी ने कौशल से अखबार खरीदकर उसे 1000 रुपए का नोट दिया लेकिन कौशल ने यह पैसे लेने से मना कर दिया और पेपर का वाजिब दाम उनसे मांगा। तब 'राहुल गांधी' इस बच्चे की खुद्दारी से प्रभावित होकर उसके 'पढ़ाई' का जिम्मा अपने सर लेने की घोषणा किये। कौशल को शुरुआती दिनों में दो महीने तक 1 हजार रुपए पढ़ाई के लिए कांग्रेस पार्टी से मिला और फिर वह भी बंद हो गया। इसके बाद कौशल तब चर्चा में आया जब मदद का श्रेय लेने के इस राजनीतिक ड्रामे में 'स्मृति ईरानी' की इंट्री हुई। स्मृति ईरानी ने 'केन्द्रीय विद्यालय' में कौशल के 'दाखिले' के लिए एक 'पत्र' लिखा, जो पूरी तरह से निष्प्रभावी रहा। 'राहुल गांधी' के दोबारा भोपाल दौरे से कौशल फिर से चर्चा में है। राहुल के पुराने वायदों को याद दिलाने और सहयोग की उम्मीद लिए कौशल का परिवार उनसे मिलने पहुंचा। यहां लाख 'कोशिशें' और 'मिन्नतों' के बाद भी कौशल और उसके परिजनों को राहुल गांधी से मिलने नहीं दिया गया।
यह तो तय हैं, कौशल की 'खुद्दारी' से प्रभावित होने वाले राहुल भले ही अपने वायदे भूल गये हों लेकिन अब उनकी 'खुदगर्जी' ने कौशल सहित कई परिवारों को यह सीख अच्छी तरह याद हो गयी कि ये करिश्माई नेता किसी के नहीं हो सकते।

काश...कोपागंज वाले मोदी जी से सफाई की सीख लेते


ये है हमारा कोपागंज...। मऊ जिला मुख्यालय से मात्र 15 मिनट लगता है यहां पहुंचने में। इस कस्बे में खिलाड़ी भी मिलेंगे और नामचीन कलाकार भी, कोट पैंट पहने अधिकारी भी दिखेंगे और लुंगी पहने बुनकर भी। लेकिन कुछ चीजें हैं जो यहां नहीं दिखने चाहिए वो भी दिख जाता है। चंदनपुरा, हुंसापुरा, दोस्तपुरा,फत्तनपुरा, चौक, भरतमिलाप, ठठेरीगली, रॉयल बुक स्टाल ऐसी दर्जनों जगह हैं जहां से आप गुजरेंगे तो आपका स्वागत जगह-जगह कूड़ों के लगे ढेर से होगा। इन सड़कों पर उन्हीं लोगों के प्रतिष्ठानों का कूड़ा अधिकत दिखता है जो सबसे ज्यादा सफाई पसंद होने का ढोंग करते हैं। यहां रहने वालें लोगों के लिए कूड़ा फेंकने का कोई निश्चित समय ही नहीं है... जब मन में आया.. सड़क को ही डस्टबीन बना देते हैं। मोदी जी अगर कोपागंज आकर भी लोगों से स्वच्छ भारत की अपील करें तो भी इनपर कोई असर नहीं होगा। जिस कोपागंज को यहां पुराने लोगों ने पहचान दिलाई और नए लोग बुलंदी पर ले गए उसी कोपागंज पर कूड़े का कालिख लगी है ।



=================================== नोट- अरे भाई अगर आप अपने आस-पास स्वच्छता रखोगे तो इससे मोदी जी का स्वास्थ्य सुधरे या न सुधरे अपने कस्बे की ही सेहत दुरुस्त होगी। आइये मिलकर हम सभी कोपागंज के निवासी एक कदम स्वच्छता की तरफ बढ़ाएं और स्वस्थ भारत के निर्माण में अपनी छोटा सा योगदान दें..

Monday, November 19, 2018

एक 'अंतर्यामी' नेता...जो भगवान की तरह पूजा जाता है


वो अक्सर हर किसी से पूछती है,बावन्नारा(ठीक हो) । बावन्नारा तेलूगु शब्द है । इसके बाद हर किसी से उसकी अपनी जबान में अगला सवाल होता...हील के साइज़ से देश के हाल तक,मजदूर की दिहाड़ी से मौसम के मिज़ाज तक,कांग्रेस की बदहाली से टीडीपी के स्वर्णिम युग तक। कुल जमा ढेर से सवाल।
कमर पर हाथ टिकाए ये मूर्ति हर किसी से सवाल करती है।कला से मेरा नाता उतना ही है जितना बोर्ड परीक्षा से बैक बैंचर का होता है,33 % तक।इसीलिए अपनी कमअक्ली पर पूरा भरोसा जताते हुए कहता हूं कि चित्रकला का तो नहीं पता लेकिन भाव कला में ये मूर्ति मोनालिसा सी है।हर किसी की तरफ उससे जुड़ा सवाल पूछती हुई। बहुत दिनों से मुझसे कह रही थी हम पर भी लिख दो।लिहाजा हमने भी लिख दिया।एक बात और जान लीजिए कि ये मूर्ति उत्तर भारत के राजनीतिक केंद्रों (चाय-पान ठेले) के लिये भले ही एंवई हो लेकिन दक्षिण में इसका दर्जा भगवान ना सही,उससे कम भी नहीं।
ये एनटी रामाराव यानी नन्दमूरि तारक रामाराव की मूर्ति है । जिन्हें लोग एनटीआर के नाम से भी जानते हैं।एनटीआर की गिनती उन नेताओं में होती है जो कुर्सी पर नहीं दिलों पर राज करते हैं।और जिनकी शख्सियत के दम पर सालों साल लोग फलते फूलते रहते हैं।
1982 में एनटीआर ने तेलुगु देशम पार्टी बनाई । भारतीय राजनीति में रथ बाद में बहुत से नेताओं के चले, लेकिन चैतन्य रथपहली बार लोगों के बीच था। पीले झंडे बैनरों और पोस्टरों से सजा एनटीआर का रथ जिस इलाके से गुजरा, वहीं राजनीति में परिवर्तन की आहट सुनी गई। कांग्रेस आंध्र में एनटीआर की नई शक्ति को भांप चुकी थी। ऐसे में जल्दी चुनाव करा लेने का फार्मूला भी काम नहीं आया।
चुनाव के नतीजे आशानुरूप थे। 294 सीटों वाली विधानसभा में तेलुगू देशम 193 और सहयोगी संजय विचार मंच को तीन सीट मिली थी। संघर्ष कामयाब हुआ था। 9जनवरी 1983 को एनटी रामाराव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। अभिनेता एनटीआर ने मुख्यमंत्री एनटीआर बनते ही किसी नायक की तरह अपने लोकलुभावन फैसलों को अमल में लाना शुरू किया। इसके बाद आदतन राजनीतिक‘उत्पात’का दौर शुरु हुआ। राज्यपालरामलाल के हाथों दांव चला गया। ऐसे समय जब एनटीआर अपनी हार्ट सर्जरी कराने के लिए अमेरिका गए हुए थे,रामलाल
ने उनकी सरकार बर्खास्त कर उनके ही वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। यह प्रचारित किया गया कि तेलुगू देशम के ज्यादातर विधायक एन भास्कर राव के साथ हैं। बीमार एनटीआर ने राजभवन में विधायकों की परेड तक कराई। लेकिन रामलाल नहीं माने। आसान विकल्पों को दरकिनार कर, फिर न्याय के लिए चैतन्य रथ राज्य में घूमा। संघर्ष चला, लेकिन जनता ने नायक तय कर रखा था,एनटीआर।आज भी इस घटना का जिक्र चिल्लपौं विशेषज्ञ सबसे पुराने वक्ताओं को बगले झांकने पर मजबूर कर देता है।
एनटीआर ने राजनीति को कई नए मुहावरे और जमीन दी। जिन लोकलुभावन तरीकों को नए दौर के नेता अपनी ‘खोज’ कहकर इतराते हैं, उनका परिचय एनटीआर ने अस्सी के दशक में ही करा दिया था। NTR अभिनय के चलते फिरते द्वीप थे । जम्हूरियत जिस दौर में नेताओं के मरते हुए ज़मीर को देख रही है उस दौर में जनता दरबार को सबसे बड़ा मानने वाला ये नायक बहुत याद आता है।

Z...एक 'कलंक' जिसे पूरा तेलंगाना ढोता है

 वैसे तो  ABCD की महिमा अपरंपार है लेकिन आज  'Z' टू A चलना होगा। तेलंगाना की सड़कों पर चलते हुए आपका ध्यान खींचेगी वहां चलने वाली सरकारी बस। कैटेगिरी के हिसाब से अलग अलग रंग,अलग अलग रेट। कुछ कॉमन है तो नंबर प्लेट पर लिखा ‘Z’।इसी अंग्रेजी के आखिरी अक्षर की कहानी ये है।इस 'Z' की कहानी आपको उसी हैदराबाद के निज़ाम तक लेकर जाएगी जिसके इतिहास को हर किसी ने अपनी अपनी कलम के कलर के हिसाब से लिखा है,काला, लाल, नीला और सफेद।  हर सरकारी बस पर लिखा 'Z' गुमान और गुस्ताखी के बीच समझौते का साइन है। 'Z' की कहानी हैदराबाद के भारत विलय की तरह फिल्मी है।एक दौर था जब आजादी से पहले हिन्दुस्तान में कहीं बस नहीं चलती थी। उस दौर में हैदराबाद रियासत में बसों का बेड़ा हुआ करता था । ये बस हैदराबाद के निजामउस्मान अली खान चलवाते थे । इन बसों की बदौलत निजाम ने 1932 में देश का पहला ट्रांसपोर्ट बनाया था । जिसका नाम ‘निजाम स्टेट रेल एंड रोड ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट’ था। आजादी के दौरान भारत संघ में रियासतों का विलय हो रहा था तब हैदराबाद के निजाम ने विलय से इनकार कर दिया था। तब  सरदार पटेल के ऑपरेशन पोलो चलाया। जब हैदराबाद रियासत का भारत में विलय हुआ तो निजाम ने तमाम अजीबोगरीब शर्तों में से एक शर्त रखी थी । उसी शर्त से 'Z' की एन्ट्री होती है । निजाम की  शर्त थी.. हैदराबाद रियासत के ट्रांसपोर्ट का नाम उनकी मां ज़ोहरा बेगम के नाम पर रखा जाए । अब इतना लंबा चौड़ा नाम तो डाला नहीं जा सकता था लेकिन हैदराबाद को भारत में शामिल भी करना था लिहाजा शर्त मान ली गई। शुरुआत का इतिहास लिखित तो नहीं मिलता लेकिन जानकारों के मुताबिक धीरे धीरे ज़ोहरा,’Z’पर सिमट गया। माताजी का नाम भी हो गया,हैदराबाद भी मिल गया। इसके बाद से सभी सरकारी बसों के नंबर प्लेट पर Z लिखा जानेलगा। निज़ाम भले ही अपने ‘पसंदीदा पाकिस्तान’ चले गए लेकिन Z यहीं रह गया। भारत की सांस्कृतिक विविधता बनकर। इतिहास में Z के ज़िक्र पर कोई जंग तो नहीं हुई,हां कानूनी तौर पर Z सरकारी बसों का अनिवार्य हिस्सा बन गया। दिए गए चित्र में नंबर प्लेट के बीचों बीच 'Z' का रूतबा साफ झलक रहा है । 

      अब थोड़ा Z से A की तरफ चला जाए क्योंकि निज़ाम की बात हो और कोई भी हैरानी से मुंह खोलने वाली बात ना बताई जाए तो पाठक बुरा मान सकता है।इसलिए एक के साथ एक किस्सा फ्री।ये किस्सा उस दौर का है जब युद्द के बाद सोने की चिरैया कंगाल हो चुकी थी। तब निज़ाम से मदद मांगी गई। तब निज़ाम ने भले ही 5 टन सोना दे दिया (आज के हिसाब से करीब 15 सौ करोड़) लेकिन जिन बक्सों में सोना भरकर भेजा गया वो निज़ाम ने वापस मांग लिए। निज़ाम की दरियादिली के साथ साथ हद कंजूसी के किस्से फिर कभी।

Wednesday, October 17, 2018

ये है सेकुलरिजम का घिनौना चेहरा। जिसमें  जिहाद का जघन्य रुप अनिवार्य है