Monday, November 19, 2018

एक 'अंतर्यामी' नेता...जो भगवान की तरह पूजा जाता है


वो अक्सर हर किसी से पूछती है,बावन्नारा(ठीक हो) । बावन्नारा तेलूगु शब्द है । इसके बाद हर किसी से उसकी अपनी जबान में अगला सवाल होता...हील के साइज़ से देश के हाल तक,मजदूर की दिहाड़ी से मौसम के मिज़ाज तक,कांग्रेस की बदहाली से टीडीपी के स्वर्णिम युग तक। कुल जमा ढेर से सवाल।
कमर पर हाथ टिकाए ये मूर्ति हर किसी से सवाल करती है।कला से मेरा नाता उतना ही है जितना बोर्ड परीक्षा से बैक बैंचर का होता है,33 % तक।इसीलिए अपनी कमअक्ली पर पूरा भरोसा जताते हुए कहता हूं कि चित्रकला का तो नहीं पता लेकिन भाव कला में ये मूर्ति मोनालिसा सी है।हर किसी की तरफ उससे जुड़ा सवाल पूछती हुई। बहुत दिनों से मुझसे कह रही थी हम पर भी लिख दो।लिहाजा हमने भी लिख दिया।एक बात और जान लीजिए कि ये मूर्ति उत्तर भारत के राजनीतिक केंद्रों (चाय-पान ठेले) के लिये भले ही एंवई हो लेकिन दक्षिण में इसका दर्जा भगवान ना सही,उससे कम भी नहीं।
ये एनटी रामाराव यानी नन्दमूरि तारक रामाराव की मूर्ति है । जिन्हें लोग एनटीआर के नाम से भी जानते हैं।एनटीआर की गिनती उन नेताओं में होती है जो कुर्सी पर नहीं दिलों पर राज करते हैं।और जिनकी शख्सियत के दम पर सालों साल लोग फलते फूलते रहते हैं।
1982 में एनटीआर ने तेलुगु देशम पार्टी बनाई । भारतीय राजनीति में रथ बाद में बहुत से नेताओं के चले, लेकिन चैतन्य रथपहली बार लोगों के बीच था। पीले झंडे बैनरों और पोस्टरों से सजा एनटीआर का रथ जिस इलाके से गुजरा, वहीं राजनीति में परिवर्तन की आहट सुनी गई। कांग्रेस आंध्र में एनटीआर की नई शक्ति को भांप चुकी थी। ऐसे में जल्दी चुनाव करा लेने का फार्मूला भी काम नहीं आया।
चुनाव के नतीजे आशानुरूप थे। 294 सीटों वाली विधानसभा में तेलुगू देशम 193 और सहयोगी संजय विचार मंच को तीन सीट मिली थी। संघर्ष कामयाब हुआ था। 9जनवरी 1983 को एनटी रामाराव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। अभिनेता एनटीआर ने मुख्यमंत्री एनटीआर बनते ही किसी नायक की तरह अपने लोकलुभावन फैसलों को अमल में लाना शुरू किया। इसके बाद आदतन राजनीतिक‘उत्पात’का दौर शुरु हुआ। राज्यपालरामलाल के हाथों दांव चला गया। ऐसे समय जब एनटीआर अपनी हार्ट सर्जरी कराने के लिए अमेरिका गए हुए थे,रामलाल
ने उनकी सरकार बर्खास्त कर उनके ही वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। यह प्रचारित किया गया कि तेलुगू देशम के ज्यादातर विधायक एन भास्कर राव के साथ हैं। बीमार एनटीआर ने राजभवन में विधायकों की परेड तक कराई। लेकिन रामलाल नहीं माने। आसान विकल्पों को दरकिनार कर, फिर न्याय के लिए चैतन्य रथ राज्य में घूमा। संघर्ष चला, लेकिन जनता ने नायक तय कर रखा था,एनटीआर।आज भी इस घटना का जिक्र चिल्लपौं विशेषज्ञ सबसे पुराने वक्ताओं को बगले झांकने पर मजबूर कर देता है।
एनटीआर ने राजनीति को कई नए मुहावरे और जमीन दी। जिन लोकलुभावन तरीकों को नए दौर के नेता अपनी ‘खोज’ कहकर इतराते हैं, उनका परिचय एनटीआर ने अस्सी के दशक में ही करा दिया था। NTR अभिनय के चलते फिरते द्वीप थे । जम्हूरियत जिस दौर में नेताओं के मरते हुए ज़मीर को देख रही है उस दौर में जनता दरबार को सबसे बड़ा मानने वाला ये नायक बहुत याद आता है।

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