Thursday, November 29, 2018

ये मोह मोह के धागे....

जब वक्त फैसला करता है तो जिंदगी की वकालत कहां चलने वाली....वक्त ने हमारे लिए भी कुछ ऐसा ही इशारा किया..रामोजी फिल्मसिटी से रुखसती का वक्त आ गया । ETV ज्वाइन करने के लिए 2008 में पहली बार हैदराबाद आया था... पता नहीं था कैसा शहर है... लेकिन ये अनजान शहर कब जिंदगी का स्थाई पता बन गया ये पता ही नहीं चला। हर मुश्किल हालात में जिंदगी की मायूसी को चुंबक की तरह सोख लेता था। आज एक बनी बनाई दुनिया से नाता टूट रहा था...बिछुड़ने की बेला में खुद को तैयार करना बहुत मुश्किल हो रहा था..जिस शहर में 10 साल रहा उस शहर में आज आखिरी दिन था...आखिरी बार ऑफिस गए। सब लोग वही थे... लेकिन मैं वहां होके भी नहीं था। कुछ मिल गए... कुछ छूट गए। आखिरी बार रोस्टर देखा... फिर सबका अभिवादन किया... कैंटीन से गुजरते हुए... सिक्योरिटी वाले को सलाम ठोकते हुए... बस में आकर बैठ गया... बस चल दी पेड़, पर्वत, नजारे देखते-देखते मोह के बंधन में कैद 10 साल की यादों का सावन बरसता चला गया... इसी उधेड़बुन में जैसे ही रामोजी फिल्मसिटी गेट से बस निकली.... आंखें भर गई थीं। पीछे मुड़-मुड़ कर देखता रहा। जैसे आज कोई आत्मा देह से निकल रही थी। रामोजी सर को सलाम किया...रामोजी जैसे इंसान दुनिया में बिरले मिलेंगे। हम भी उन हजारों लोगों में से थे जिनको रामोजी सर की छत्रछाया में प्रगति करने का मौका मिला। माइक्रो मैनेजमेंट के जादूगर रामोजी सर को नमन करते हैं । रामोजी के बस से आखिरी बार भाग्यलता तक का सफऱ किया । अगले दिन सुबह मुझे सिकन्दराबाद स्टेशन जाना था... मैं भाग्यलता बस स्टैंड पहुंचा... 290 नंबर की बस का इंतजार था...यही वो बस है जो मुझे घर पहुंचाने के लिए दूर से पहचान लेती थी... हमेशा की तरह कंडक्टर ने पूछा..टिकट- टिकट... मैंने बोला सिकंदराबाद। आखिरी बार सिकंदराबाद जा रहे थे... रास्ते में सबकुछ याद आ रहा था... वो NTR गार्डन...वो कोट्टी... वो एबिड्स... वो पंजा गुट्टा... वो हाईटेक सिटी... वो दिलसुखनगर, वो एलबी नगर, वो हयात नगर... वो वनस्थलीपुरम... वो सोहन टी स्टाल की चाय...मेरा फेवरिट रामाकृष्णा ग्लिटरेटी थिएटर ....ना जाने कितने ऐसे जगह हैं जो हमेशा के लिए मुस्कुराने की वजह बन गए। सोचते-देखते...सिकंदराबाद स्टेशन पहुंचे... 1 घंटे के इंतजार के बाद प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर सुपरफास्ट एक्सप्रेस दानापुर सिकंदराबाद आई... ट्रेन में सामान रखा...दिल धड़क रहा था... सबकुछ फिल्म की तरह दिमाग में घूम रहा था। इसी बीच हल्की सी हरकत हुई ... ट्रेन चल चुकी थी.. खिड़की खोली.. आंखें भर गई थी...जिस शहर ने मेरी 'आंखें खोली' थी उसी आंखों से शहर को 'देखता' चला गया । इन अनमोल यादों को लेकर एक मुसाफिर की तरह....मैं जिंदगी के 'अगले स्टेशन' की ओर बढ़ गया । अलविदा हैदराबाद
(कुछ शुभ चिंतकोंं की यादों ने आज स्पर्श किया )

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