Saturday, December 24, 2011

लोकपाल से पहले "राइट टू थप्पड़" !

सरकार जैसे "बीपीएल कार्ड " थमाकर अनाज नहीं देती है वैसे ही "लोकपाल थमाकर सीबीआई नहीं देना चाहती "। अन्ना को इस "सरकारी कुतर्क" को समझने में 13 दिन वाले अनशन का रिकार्ड नहीं बल्कि "ऐसे सारे मिथक तोड़ना होगा जो दस जनपथ से संचालित होती है"। जब केन्द्र से एक रूपया गरीब के लिए चलता है तो उसके हाथ में 25 पैसा ही आता है।राजीव गांधी के इस बयान को अन्ना भूल कर पूरा एक रूपया मांगने की गलती कर बैठे थे। अन्ना कहते रह गए....सरकार सुनती रह गयी और जनता देखती रह गयी।"आजादी छाप पाकिस्तान " की तरह "आजादी " छाप लोकपाल बनाना चाहती है। तालिबानी धमाका करके ताली बजाएंगे और गिलानी सरकार देखती रह जाती है वैसे ही भ्रष्टाचारी घोटाला करेंगे और लोकपाल देखता रह जाएगा। "पैदा होने से पहले नसबंदी वाला ये लोकपाल पूरी दुनिया का पहला मामला है"। लोकपाल के दायरे में सीबीआई हो ना हो....ग्रुप सी हो ना हो....सिटीजन चार्टर हो ना हो...सरकार के लिए ये कोई बड़ा मसला नहीं है जितना की अब आरक्षण है। लोकपाल के नो एंट्री जोन में आरक्षण का परमिट देने की बात करके सरकार ने "गुस्से की ज्वालमुखी " को "सुनामी " बना दिया है।सवाल ये है कि जब सीबीआई,सीवीसी,चुनाव आयोग में आरक्षण नही है तो लोकपाल में क्यों।आरक्षण देने के लिए सरकार इतनी बेचैन थी कि लोकपाल में नहीं दे पाने का मलाल बर्दाश्त से बाहर हुआ तो ओबीसी कोटे में ही कोटा बनाकर साढ़े चार फीसदी आरक्षण का तोहफा अल्पसंख्यकों को सौंप दी। जब पूछो तो कहेंगे "मजबूत बिल " ला रहे हैं।जब पूछो तो कहेंगे "सशक्त बिल" ला रहे हैं। जब पूछो तो कहेंगे "ऐतिहासिक बिल " ला रहे हैं।मजबूत, शसक्त और ऐतिहासिक करते करते इतना "ताकतवर" बिल लेकर आयी है कि अब "इसे वापस लेने के लिए अनशन करना पड़ा रहा है "सरकार.....अन्ना के मांगो में अनुप्रास लगाकर वीर रस से भरी रहती थी"पिसान पोतकर भंडारी बनी" सरकार लोकपाल में "लोहे की तरह मजबूत" बिल बनाती रही ।फिर भी अगर "रामगोपाल वर्मा के शोले " की तरह लोकपाल ले आयी है तो सरकार के इस "नासमझी का सम्मान " करिए। अब ये मत पूछिएगा.....सरकार को भ्रष्टाचारियों के आंसू क्यों नहीं देखे जाते। मनमोहन सिंह से पूछिए जब महंगाई पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं तो देश में उनका क्या काम।चिदंबरम से पूछिए जब भ्रष्टाचार में खुद शामिल हैं तो गृहमंत्रालय में उनका क्या काम।राहुल से पूछिए "संवेदना का लाइसेंस" दस जनपथ से बनता है "उम्र के हिसाब" से बनाया जाता है।"सरकार अपने ऊपर लगे लांछनों को अपनी खूबियां बताकर ऐसे चहकती है कि पूरी बात "विशेषण " बन जाती है।लेकिन अन्ना तो सरकार के "समुच्चय बोध " को "विस्मयकारी बोध" में बदलने के लिए "अपव्यय की सभी कलाओं" से वाकिफ हैं। इस दौरान अगर मनमोहन सिंह "मध्यम पुरूष" से "उत्तम पुरूष का सर्वनाम " बन गए तो यकीन मानिए लोकपाल की लड़ाई में "पाल" तो रहेगा लेकिन "लोक " नया प्रत्यय बन जाएगा "

Saturday, October 29, 2011

"गैंग-ऑफ-सेकुलर" का आत्मघाती जुबान

गजब...गजब....दिग्विजय सिंह गजब।आप की बात कला का कोई जवाब नहीं। अपनी "फिदायीन बयान" से धमाका करने वाले दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीति की दशा की ऐसी "दुर्दशा " की है जिसे सुधारने में अन्ना की "ईमानदारी ",रामदेव का "संस्कार " और संघ का "आदर्श " आड़े आ रहे हैं।जो सरकार आतंकवाद से बेमौत मरे लोगों के कफन को मजबूरियों की वजन से तौलने पर तुली थी...जो सरकार विध्वंस की लपटों के बीच दिल्ली के एक होटल में जलवा फरोश हसीनाओं की कमर परख रही थी


























जो सरकार महंगाई पर जुबान पर मेंहदी लगाकर बैठी हो....जो सरकार कॉमनवेल्थ के कलंककथा के सूत्रधार हो....जो सरकार टूजी घोटाले पर "मन"मौजी हो...जो सरकार मनरेगा पर महालूट का हिस्सा मांग रही हो...यूपीए सरकार की इन "महान उपलब्धियों" पर नाचने के बजाय दिग्विजय सिंह "भ्रष्टाचार पर मातम" मना रहे हैं...सीना पिट रहे हैं..आपा खो रहे हैं....कांग्रेस की कब्र खोद रहे हैं।"तेजाबी जुबान से विरोधियों को बदहवाश " कर देने वाले दिग्विजय सिंह श्री श्री को भाजपा से बचने की सलाह दी हैमतलब कोई कांग्रेसी दस जनपथ जाएं और सोनिया से ना मिले। ये वही दिग्विजय सिंह है....जो सुबह कहते है राहुल से बढ़िया पीएम कोई नहीं हो सकता और शाम होते ही कहते हैं मनमोहन से ताकतवर पीएम कोई नहीं है। ये वही दिग्विजय सिंह है...जिनके मोबाइल पर मुम्बई हमले के दौरान हेमंत करकरे ने फोन किया था... ये वही दिग्विजय सिंह है...जो आजमगढ़ के संजरपुर में आतंकवादियों के घर रोजा खोलते हैं।ये वही दिग्विजय सिंह है...जिन्हे हर घटनाक्रम में कांग्रेस से ज्यादा "संघ का हाथ " मजबूत लगता है। लीबिया में गद्दाफी के आगे जी लगाने वाला पैदा नहीं हुआ ...और भारत में ओसामा को "जी" कहने वाले ..."जी का जंजाल " बन गए।अन्ना ने जब अपने ब्लॉग ने "गैंग ऑफ फोर" का जिक्र किया था तो कांग्रेसियों में खलबली मच गयी थी।नेताओं को नाम जानने की बेचैनी बढ़ गयी।चिंता सताने लगी... "अगर गैंग ऑफ फोर में शामिल नहीं हुए तो सोनिया को क्या मुंह दिखाएंगे "।जैसे पता चला लिस्ट में विशिष्ट घाघपन और कमीनेपन की क्वालिटी के आधार पर "वही चार " हैं तो मुंह पर हाथ रख लिए।नेताओं ने गैंग- ऑफ- सेकुलर में दावेदारी और स्थायी सदस्यता को ठुकरा दिए।भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन को साम्प्रदायिक रंग देने में पिग्विजय सिंह लगे हैं।विवादों से घिरी टीम अन्ना से दिग्विजय सिंह ने कहा है कोर कमिटि में असली चेहरे को शामिल करे। गोविंदाचार्य,गूरूमूर्ति और अजीत डोभाल, दिग्विजय सिंह को असली मोहरे लगते हैं। पहले तो टीम अन्ना के बयानों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा था अब टीम अन्ना के सदस्यों को ही तोड़ा मरोड़ा जा रहा है।दिग्विजय सिंह का मतलब साफ है...अब गोविंदाचार्य गूरूमूर्ति और अजीत डोभाल को "प्रशांत भूषण" बनाना चाहते हैं। वो अलग बात है कि सिरफिरे हमलावरों को किसी ने दिग्विजय सिंह की जगह प्रशांत भूषण का गलत ठिकाना बता दिया। (जारी है)

Monday, October 3, 2011

तेलंगाना.....भावनाओं का द "मन"

यकीन मानिए....भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है ।जिससे खिलवाड़ करके कांग्रेस अपना हाथ जला रही है।तेलंगाना की आग आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की सिय़ासी अंत्येष्टि के लिए धधक रही है और सरकार , तेलंगाना के आश्वासन को नीबू मिर्ची की तरह लटका कर मुहम्मद बिन तुगलक की तरह.....चमड़े का (सिक्का नहीं ) जुबान चला रही है। तेलंगाना को लेकर जब कृष्णा कमेटी ने चिदंबरम को रिपोर्ट सौंपी थी तो चिदंबरम ने तेंलगाना बनाने के पांच विकल्प सुझाए थे...ध्यान दिजिएगा ...कौन बनेगा करोड़पति में भी चार विकल्प रहता है।लेकिन केबीसी की तरह केबीटी यानी "कौन बनाएगा तेलंगाना "के खेल में चिदंबरम ने... डबल डीप भी लगाई ...विशेषज्ञों से मदद भी ली ...जनता से राय भी ली...और जब बात जवाब देने की आयी तो चिदंबरम क्विट कर निकल लिए। वाह चिदंबरम साहब वाह ..जनता की भावनाओं से अच्छा खेले











तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष चन्द्रशेखर राव का राजनीतिक भाव गिराने के लिए कांग्रेस ने जो पैंतरे आजमाए...वहीं पैतरें कांग्रेस के बोझ बन गयी हैं। भावनाओं से छेड़खानी में माहिर कांग्रेस तेलंगाना मामले को लटका कर चाहे जो नफा -नुकसान सोच रही हो...इतना तय है कि आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की खुदकुशी पर कभी ना खत्म होने वाले जश्न के लिए तेलंगाना के लोग तैयार हैं। तेलंगाना की मांग करने वाले पिछले कई सालों से मर मर कर जी रहे हैं। तेलंगाना में विरोध की आग में जज्बात खौल रहे हैं....भावनाओं की भट्ठी में आंसू भांप बन कर उड़ रहे हैं...वक्त इतिहास का इम्तेहान ले रही है...बाजुओं की ताकत संयम की दहलीज पर गिड़गिड़ा रही है...राजनीति हावी हो रही है....अर्थनीति खिसक रही है....क्या-क्या बताएं क्या -क्या हो रहा है।बस ये समझ लिजिए यहां आगे- आगे तेलंगाना पीछे -पीछे खौफनाक मजाक। कांग्रेस ये समझ ले की ये कोई अफजल गूरू के फांसी का मसला नहीं है जो लटका कर रख पाएगी।ये कोई कैश फॉर वोट का मसला नहीं है जो आवाज उठाने वाले को दबा देगी।ये कोई टूजी का मसला नहीं है जो चिदंबरम पर कानूनी चाबुक चलाने से कांग्रेस रोक लेगी।"हिंदू-मुस्लिम ”, "भारत-पाकिस्तान '',''गांधी-अन्ना'',''अमीरी -गरीबी '',''देशभक्त -गद्दार '',''आतंकवादी -भगवावादी '',''नक्सलवादी -उग्रवादी '',"अफजल -असीमानंद " यानी बंटवारे को बपौती समझने वाली कांग्रेस के लिए तेलंगाना...दबी पांव आने वाली एक ऐसी सियासी आहट है....ऐसी घबराहट है....ऐसी हिचकिचाहट है …...जो कांग्रेस की सिय़ासी आशावाद की अंत्येष्ष्टि पर गर्व महसूस करेगीधारणाओं को ध्वस्त करने वाली बुनियाद सिर्फ सवालें खड़ा करती हैं....सरकार इससे इत्तेफाक भले ही ना रखती हो...लेकिन ये इस वक्त का सबसे बड़ा सच यही है। इतिहास अपने वक्त के नायकों का मकाम देखती है पीएम साहब...लेकिन यहां तो आप के रहनुमाई में एक चिट्ठी के मजमून पर मनमुटाव की ऐसी लकीर खिचीं है जिसे मिटाने के लिए "सोनिया शक्तिपीठ" की तेजाबी धूल को जनता की आंखो में झोंक दिया गया"आदमखोर कांग्रेस " इतनी "तत्परता " तेलंगाना के लिए दिखाती तो कांग्रेस की छवि पर जनता को छटपटाहट नहीं होतीपीएम कह रहे हैं वक्त लगेगा...चिदंबरम कर रहे हैं वक्त लगेगा...प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं वक्त लगेगा...ऊपर से गुलाम नबी आजाद की शांति की अपील। सुन लिजिए अभी यहीं अटके हैं देश के रहनुमा। पहले लोग शांत हो जाएं ...विरोध खत्म हो जाए...संस्कार बदल जाए...सरोकार बदल जाए...तब ये कुछ करेंगे।तबकर "हाथ" बांधे रहेंगे।कर लो कोशिश।तब तक लगा लो दम...दिखा लो ताकत...साहब को अभी और वक्त लगेगा।इतना वक्त काफी नहीं है। तबतक मंदिर जाइए...मस्जिद जाइए...गुरूद्वारा जाइए..मत्था टेकिए ...सिर नवाइए ...भजन कीर्तन करिए ...चुपचाप सुनते रहिए...सहते रहिए...मुंह मत खोलिए ...लेकिन इनसे उम्मीद मत करिए।पूछिए सरकार से...आप की जरूरत क्या हैतेलंगाना पर सुलगते सवालों से भाग रही है सरकार। मुंह चुरा रही है सरकार। सरकार तेलंगाना पर जुबानी जुमलेबाजी करके खौलते सच को अपने ख्यालों से दबा रही है।अपनी कमियों को मजबूरियों के ढ़ेर से दबा देना चाहती है सरकार।भावनाओं की टहनियों पर स्वार्थों की बर्छी चलाने वाले आखिर आवाम के भरोसे के चौकिदार कैसे हो सकते हैं


Wednesday, September 7, 2011

ऐसे होतें हैं राजनीति में "अमर" ?

06 सितंबर 2011 की घटना भारतीय इतिहास में एक ऐसा पड़ाव बन गयी जिसका जब-जब जिक्र आएगा..अमर सिंह को अपनी "विस्मयकारी चालाकी" पर "अविश्वसनीय हंसी" आएगी 6 सितंबर को अमर सिंह को वोट फॉर नोट मामले में तीसहजारी कोर्ट ने पेश होने को कहा था।अमर सिंह खुद नहीं आए उनके वकील असगर खान अमर सिंह के बीमारी का दलील लेकर कोर्ट पहुंचे।"दलीलों की खतौनी " देखकर जज बिफर पड़ी...कहा कि दो घंटे के भीतर मेडिकल रिपोर्ट के साथ अमर सिंह हाजिर हों।













"बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा था और असगर उसे जोड़ने में लगे थे"।कहा कि मेडिकल रिपोर्ट आने में दो दिन लगेंगे। 12.30 मिनट पर अमर सिंह को हाजिर होना था। लेकिन वकील असगर खान ने कहा अमर सिंह 6 सितंबर यानी पेशी के दिन नहीं आ सकते। इस दलील पर कोर्ट ने कहा अमर सिंह हर हाल में हाजिर हों।मेडिकल रिपोर्ट के साथ हाजिर हों। कोर्ट के तेवर देख 15 किलोमीटर दूर अमर सिंह को भागने का ना तो समय मिला और ना ही जगह।अमर सिंह मेडिकल रिपोर्ट के साथ "अपनी चालाकी" नहीं भूले और अपने वकील को बिना बताए सिर पर पैर रख कर कोर्ट भागे ।अच्छे अच्छों को एक नजर में भांपने वाले अमर सिंह कोर्ट को नहीं भांप पाए।जो अमर सिंह घंटे भर चल नहीं सकते थे ...कोर्ट का करेंट लगते ही उनके के पैरों में पहिए लग गए और हांफते -हांफते कोर्ट पहुंचे।कोर्ट को दैहिक ,दैविक ,भैतिक तापा को समझाने में 45 मिनट लग गए।22 जुलाई 2008 को "सरकार की आजादी " को बचाने वाले अमर सिंह इस 45 मिनट में अपनी आजादी नहीं बचा पाए।और राजनीति की सबसे बड़ी बाजी हार कर जेल पहुंच गए। 13साल सपा की सेवा करने वाले अमर सिंह से मिलने के लिए सपा के नेता 13 सेकेंड नहीं निकाल पाए।"कुर्सी को कौम" बनाकर करोड़ों कूटने वाले अमर सिंह अपनी सफलता के पीछे के शुक्राचार्यों का नाम जुबान पर आते ही तबियत बिगड़ जाती है ।पता नहीं कौन सा रोग है जिसे पत्रकारों को दिखाने के लिए पैंट उतारना पड़ता था।राजनीति को अपने शर्तों पर चलाने वाले अमर सिंह सांसे जेल की घंटी पर चल रही हैं।अमर सिंह जेल जाने से बच जाते अगर लोकतंत्र का ये कुचक्र सरकार को बचाने के लिए नहीं करते। एक गुमनाम गुस्ताखी ने लोकतंत्र की हया पर सियासत की बेशर्मी को इतना ऊंचा उठा दिया कि राजनीति के खोखले संस्कार अनिवार्य सत्ता के तौर पर स्थापित हो गई है । बयानों के बेताज बादशाह को आज अपने दौर की आजमाइश का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है।

Monday, August 29, 2011

अन्ना की "पुरी"कथा

चलिए कम से कम अन्ना का नशा तो उतरा।वरना शिथिल सोसाइटी ने तो "रण बीच चौकड़ी भरने वालों " की हवा निकाल दी थी । अब तीर तलवार से नहीं...माइक , नारा और टोपी से पूरा मामला निपट जा रहा है। दिन में इंकलाबियों की फौज रात में मोमबत्ती बि-ग्रेड। इसमें उन्नीस -बीस होती अन्ना की सेहत । बारह दिन बाद यानी 28जुलाई 2011 को परमानेंट अनशनकारी अन्ना ने अनशन तोड़ा तो पूरा देश ऐसे खुश हुआ जैसे अनशन का विश्वकप जीत लिया हो। अन्ना के "बुढापे के इंश्योरेंस " के भाव का सूचकांक गुस्से के शेयर बाजार में इतने उंचे हो गए की सरकार को खरीदना मुश्किल हो गया।दलाल पथ के एक स्वामी को लगाया । स्वामी के वेश में अग्निवेश का खुलासा होते ही सरकार की "घातक ईमानदारी " और अग्निवेश की "वीभत्स सच्चाई " देश के सामने आ गयी । आजादी की दूसरी लड़ाई दलालों के नेतृत्व में लड़ी गयी।







































अनशन के साइड इफेक्ट भी देखिए देश के सारे षड़यंत्रकारियों को एक कर दिया।बस अमर सिंह और दिग्विजय सिंह छूट गए।दोनों पता नहीं किसको फंसाने के लिए कौन सी चाल सोच रहे होंगे।मन है विश्वास पूरा है विश्वास गाते गाते....कुमार विश्वास से ओमपुरी ने माइक थामकर सरकार की छिपी हुई "दुर्लभ विशेषताओं" को गिना डाली।नालायक ,गंवार और अनपढ़ जैसे शब्दों का तमगा माननीयों को दिया तो "जेपी की शुक्राणु "से पैदा हुए लालू और शरद यादव को "सच्चाई का एहसास " होते ही संसद में बमक पड़े।इनकी बातें जेपी से शुरू होती है जेपी पर ही खत्म होती है।"बस समझ लिजिए...लालू ना हुए जेपी के.......हो गए"।अब जाकर ओमपुरी के ताने पर इनकी नींद खुली है।अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं …......दनुजबनकृशानुम , ग्यानिनामअग्रगण्यं …..लोकपाल कम लोचपाल ज्यादा है।उपर से आरक्षण ।आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाने वालों के हाथ तो मानों ब्रम्हास्त्र की तरह लोकहास्त्त्र लग गया।।लोकपाल बिल के बाद साम्प्रदायिक बिल और रॉइट टू रिकॉल जैसे बिल के लिए सरफरोशी छाप समर्थको की सही जरूरत पड़ेगी लेकिन उसके लिए पता नहीं अन्ना के टोपी छाप रक्तबीजों की फौज आएगी या नहीं लेकिन इतना जरूर है इस बिल के लिए अन्ना के अनशन की सबसे बड़ी जरूरत होगी।लेकिन यहां ऐसी अंधेरगर्दी मची है की.... धन और भक्ति खूब बटेगा...अपना अपना छोड़के।वाह.... विद्यावान गुणी अति चातुर.....

इस अनशन की "मर्डर -मिस्ट्री " भी समझना होगा

1.सरकार को सरकारी अंदाज में अन्ना की भूख से निपटते देख टीम हन्ना (हां और नां में फंसी )की सेहत सरकार से भी ज्यादा खराब थी ।

2.सरकारी तर्क और अन्ना की शर्त के फर्क को समझने में 12 दिन इसलिए लगे कि दोनों अपने अड़ियल ईमानदारी पर "भाव खा रहे थे "

3.सरकार पहले मान लेती तो इसी रामलीला मैदान में तुरंत पूरी जीत की घोषणा हो जाती ।इसलिए सरकार ऐसे मोड़ पर आकर मानी जहां से अन्ना का रास्ता संविधान ने बंद कर दिया था

4.स्टेडिंग कमेटी को प्रस्ताव भेजकर टीम हन्ना की शराफत पर बदनीयति का चादर ओढ़ा दिया

5.गुमनाम जश्न के लिए पूरा देश ऐसे बेचैन था जैसे कल तक लोकतंत्र ,राजा के साथ तिहाड़ में बंद था

इस अनशन ने कई सूरमाओं का खारिज कर दिया। जिनके बयानों से लोकतंत्र बोझ लगता था। कपिल सिब्बल से लेकर संदीप दीक्षित जैसे कुछ समझदार नेताओं ने इस बोझ का वजन इतना ज्यादा बढ़ा दिया था कि टीम अन्ना का उठना मुश्किल हो गया था। लेकिन "नारियल -जूस और शहद से भरी दोपहरी में अन्ना ने ऐसा रोजा खोला कि हैप्पी एंडिग की तरह सब अपनी अपनी सीट से उठे और चलते बने ।जैसे " सबका मालिक अन्ना "का नून शो देख रहे थे "। आजादी की पहली लड़ाई में लाल बाल पाल कक्षा आठ के इतिहास में जगह बनाने में कामयाब हो गए....लेकिन " आजादी की दूसरी लड़ाई के लाल- बाल -पाल उर्फ भूषण,हेगड़े और केजरीवाल पर मंथन चल रहा है "।पूरी लड़ाई जीतने के बाद पता चल जाएगा।वैसे अन्ना छाप अनशन ने बड़ी छाप छोड़ी है..हो सकता है आने वाले दिनों में अन्ना की आधी जीत से पहले ही सरकार "अनशन अधिनियम "को पारित कर ले।