Monday, October 3, 2011

तेलंगाना.....भावनाओं का द "मन"

यकीन मानिए....भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है ।जिससे खिलवाड़ करके कांग्रेस अपना हाथ जला रही है।तेलंगाना की आग आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की सिय़ासी अंत्येष्टि के लिए धधक रही है और सरकार , तेलंगाना के आश्वासन को नीबू मिर्ची की तरह लटका कर मुहम्मद बिन तुगलक की तरह.....चमड़े का (सिक्का नहीं ) जुबान चला रही है। तेलंगाना को लेकर जब कृष्णा कमेटी ने चिदंबरम को रिपोर्ट सौंपी थी तो चिदंबरम ने तेंलगाना बनाने के पांच विकल्प सुझाए थे...ध्यान दिजिएगा ...कौन बनेगा करोड़पति में भी चार विकल्प रहता है।लेकिन केबीसी की तरह केबीटी यानी "कौन बनाएगा तेलंगाना "के खेल में चिदंबरम ने... डबल डीप भी लगाई ...विशेषज्ञों से मदद भी ली ...जनता से राय भी ली...और जब बात जवाब देने की आयी तो चिदंबरम क्विट कर निकल लिए। वाह चिदंबरम साहब वाह ..जनता की भावनाओं से अच्छा खेले











तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष चन्द्रशेखर राव का राजनीतिक भाव गिराने के लिए कांग्रेस ने जो पैंतरे आजमाए...वहीं पैतरें कांग्रेस के बोझ बन गयी हैं। भावनाओं से छेड़खानी में माहिर कांग्रेस तेलंगाना मामले को लटका कर चाहे जो नफा -नुकसान सोच रही हो...इतना तय है कि आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की खुदकुशी पर कभी ना खत्म होने वाले जश्न के लिए तेलंगाना के लोग तैयार हैं। तेलंगाना की मांग करने वाले पिछले कई सालों से मर मर कर जी रहे हैं। तेलंगाना में विरोध की आग में जज्बात खौल रहे हैं....भावनाओं की भट्ठी में आंसू भांप बन कर उड़ रहे हैं...वक्त इतिहास का इम्तेहान ले रही है...बाजुओं की ताकत संयम की दहलीज पर गिड़गिड़ा रही है...राजनीति हावी हो रही है....अर्थनीति खिसक रही है....क्या-क्या बताएं क्या -क्या हो रहा है।बस ये समझ लिजिए यहां आगे- आगे तेलंगाना पीछे -पीछे खौफनाक मजाक। कांग्रेस ये समझ ले की ये कोई अफजल गूरू के फांसी का मसला नहीं है जो लटका कर रख पाएगी।ये कोई कैश फॉर वोट का मसला नहीं है जो आवाज उठाने वाले को दबा देगी।ये कोई टूजी का मसला नहीं है जो चिदंबरम पर कानूनी चाबुक चलाने से कांग्रेस रोक लेगी।"हिंदू-मुस्लिम ”, "भारत-पाकिस्तान '',''गांधी-अन्ना'',''अमीरी -गरीबी '',''देशभक्त -गद्दार '',''आतंकवादी -भगवावादी '',''नक्सलवादी -उग्रवादी '',"अफजल -असीमानंद " यानी बंटवारे को बपौती समझने वाली कांग्रेस के लिए तेलंगाना...दबी पांव आने वाली एक ऐसी सियासी आहट है....ऐसी घबराहट है....ऐसी हिचकिचाहट है …...जो कांग्रेस की सिय़ासी आशावाद की अंत्येष्ष्टि पर गर्व महसूस करेगीधारणाओं को ध्वस्त करने वाली बुनियाद सिर्फ सवालें खड़ा करती हैं....सरकार इससे इत्तेफाक भले ही ना रखती हो...लेकिन ये इस वक्त का सबसे बड़ा सच यही है। इतिहास अपने वक्त के नायकों का मकाम देखती है पीएम साहब...लेकिन यहां तो आप के रहनुमाई में एक चिट्ठी के मजमून पर मनमुटाव की ऐसी लकीर खिचीं है जिसे मिटाने के लिए "सोनिया शक्तिपीठ" की तेजाबी धूल को जनता की आंखो में झोंक दिया गया"आदमखोर कांग्रेस " इतनी "तत्परता " तेलंगाना के लिए दिखाती तो कांग्रेस की छवि पर जनता को छटपटाहट नहीं होतीपीएम कह रहे हैं वक्त लगेगा...चिदंबरम कर रहे हैं वक्त लगेगा...प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं वक्त लगेगा...ऊपर से गुलाम नबी आजाद की शांति की अपील। सुन लिजिए अभी यहीं अटके हैं देश के रहनुमा। पहले लोग शांत हो जाएं ...विरोध खत्म हो जाए...संस्कार बदल जाए...सरोकार बदल जाए...तब ये कुछ करेंगे।तबकर "हाथ" बांधे रहेंगे।कर लो कोशिश।तब तक लगा लो दम...दिखा लो ताकत...साहब को अभी और वक्त लगेगा।इतना वक्त काफी नहीं है। तबतक मंदिर जाइए...मस्जिद जाइए...गुरूद्वारा जाइए..मत्था टेकिए ...सिर नवाइए ...भजन कीर्तन करिए ...चुपचाप सुनते रहिए...सहते रहिए...मुंह मत खोलिए ...लेकिन इनसे उम्मीद मत करिए।पूछिए सरकार से...आप की जरूरत क्या हैतेलंगाना पर सुलगते सवालों से भाग रही है सरकार। मुंह चुरा रही है सरकार। सरकार तेलंगाना पर जुबानी जुमलेबाजी करके खौलते सच को अपने ख्यालों से दबा रही है।अपनी कमियों को मजबूरियों के ढ़ेर से दबा देना चाहती है सरकार।भावनाओं की टहनियों पर स्वार्थों की बर्छी चलाने वाले आखिर आवाम के भरोसे के चौकिदार कैसे हो सकते हैं


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