पहले इस तस्वीर को में तीनों किरदार के चेहरों को देखिये ।
हिम्मत,हसरतेंऔर हिस्सेदारी यही भाव है इनके चेहरे पर।इनका परिचय आगे कराएंगे।लेकिन उससे पहले आप को फ्लैशबैक में से चलते हैं।।एक तरफ रिश्ता था तो एक तरफ प्यार।एक तरफ खुशियां थी तो एक तरफ इंतजार।एक तरफ उम्मीदों का सावन तो एक तरफ तमन्नाओं की हरियाली।इन सबके बीच दांव पर लगी थी तीन जिंदगियां।प्यार की खातिर रिश्ते की कुर्बानी की ये अनोखी दास्तान है अनंतपुर की।तीन महिने पहले धनंजय ने हिंदुपुर की पवित्रा के साथ शादी की।नयी जिंदगी शुरू करने के लिए बधाइयों का दौर चला।लेकिन जिंदगी में खुशियों के खिलखिलाने से पहले ही अंधेरा छा गया।पवित्रा ने ससुराल जाने से इनकार कर दिया।परिवार की नीलाम होती इज्जत बचाने के लिए धनंजय ने पवित्रा के हाथ जोड़े....मिन्नतें की..रिश्ते की दुहाई दी।लेकिन पवित्रा का कलेजा तो जैसे पत्थर का बना था।गिड़गिड़ाते धनंजय की आंखो में आंसू देख पवित्रा पिघल गयी।पवित्रा की लड़खड़ाती जुबान से जैसे ही निकला..... मैं गोपी से प्यार करती हूं।धनंजय के पैरों तले जमीन खिसक गयी।लगा जैसे अरमानों के जनाजे को खुद ही कंधा दे रहा है।रिश्ते पर प्यार के अतीत की परछाई पड़ते ही धनंजय के हाथों से जिंदगी का अख्तियार छूटने लगा।ये तो था फ्लैशबैक...अब क्लाईमेक्स सुनिए।इस शर्मनाक सच्चाई को गले लगाने के लिए धनंजय एक कदम भी पीछे नहीं हटा।और निकल पड़ा पवित्रा को उसके प्यार गोपी से मुलाकात कराने।उफ...तक नहीं निकला धनंजय के मुंह से।रिश्ते रास्ते में बदल गये और मायूसी,मंजिल बन गयी।इस अनजान सफर में कई बार रिश्ते की आहट ने दिल का दरवाजा खटखटाया लेकिन धनंजय तो दिलेर निकला।मन के सवालों को इरादों से जवाब देता गया।और इसी उधेड़बुन में धनंजय,पवित्रा को लेकर पहुंच गया गोपी के चौखट पर।प्यार मंजिल तक पहुंच चुकी थी।बस गोपी का आना बाकी थी।लेकिन जब दरवाजा खुला तो गोपी के मुंह से बेवफाई सुनकर पवित्रा को जबरदस्त धक्का लगा।फिर..क्या।धरना प्रदर्शन,क्या हंगामा।मान मनौव्वल के दौरान पुलिस भी आ गयी। पुलिस को माजरा समझते देर नहीं लगी। और हाथों हाथ जोड़ी बना दी।3फरवरी 2011तक हम दिल दे चुके सनम दोहराया गया। लेकिन अगले ही दिन हम फंस चुके सनम हो गया।अगले दिन यानी 4 फरवरी 2011 को पवित्रा को प्यार की अंधेरगर्दी समझते देर नहीं लगी। और गोपी के साथ रहने से इनकार कर दिया।जिंदगी में आदमी खुशियों से समझौता नहीं कर पाता है। और यहां तो प्यार के लिए रिश्ता ही दांव पर लगा था।महानगरों की भागती जिंदगी की ऐसी ना जाने कितनी खबरें आती हैं जिसमें शक की चारदीवारी में घुट घुट कर इंसान दम तोड़ देता हैं।लेकिन दर्द का अजायबघर बने धनंजय ने तो शक की दीवारों को गिराकर प्यार को आजाद किया था।खैर...धनंजय ने जब गोपी को पवित्रा से मिलाया तो आंखे नम थी लेकिन चेहरा मुस्कुरा रहा था।वाकई रिश्ते की कुर्बानी देकर प्यार की बुनियाद रखने वाले बिरले ही मिलते हैं।
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