सियासी उल्टी कर दी।विरोधियों को मछली की आंख की तरह केवल बंगाल दिख रहा था।जब जब बंगाल का जिक्र आया लुटियन्स के टीले पर बैठे माननीयों की जुबान कटार बन गयी।ममता मेल में श्रीमानों की फौज को जगह नहीं मिली तो बौखलाहट में कह दिया बम बम बंगाल,बाकी कंगाल।पता नहीं विरोधियों ने कौन सा हिसाब पढा है।जब दुरंतो बंगाल के सियालदह से उड़ीसा के पुरी तक चलेगी ।फिर दुरंतों को सिर्फ बंगाल से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है।रेल फैक्ट्री जब बंगाल में लगेगा तो बंगाल के लोगों को रोजगार मिलेगा।यूपी में लगेगा तो यूपी के लोगों को रोजगार मिलेगा।इतनी सी बात समझ में नहीं आयी।उल्टे कुतर्कों की आंच पर ऐसी अफवाह पकायी की उनकी सियासी स्वार्थ की दुर्गंध में भारतीय रेल का दम घुटने लगा।ममता के रेल बजट पर विरोध का एहसान करने वालों सुन लो, ममता एक्सप्रेस अब नहीं रूकने वाली।पटरीयां उखाड़ों ,पत्थर फेंको
,चेन पुलिंग करो,बाजुओं में ताकत हो तो इंजन रोक लो।सिंगूर और नंदीग्राम के प्लेटफार्म से निकली ममता मेल अब रेड सिग्नल से नहीं रूकने वाली।दीदी के पास राजनीतिक तजुर्बा है।इसी तजुर्बे से बंगाल में टीएमसी के बीज डाले थे।जिसकी फसल अब लहलहा रही है।लालू के जमाने में भी भारतीय रेल बिहार की जागीर बन गयी थी।तब तो जाहिलों की जमात ने लालू की छाछ को फूक फूक कर पीया था। अनंतकुमार रहे हैं..बंगाल का बजट है।कीर्ति आजाद कह रहे है...बंगाल का बजट है।गोपी नाथ मुंडे कह रहे हैं...बंगाल का बजट है।शहनवाज हुसैन कह रहे हैं...बंगाल का बजट है।मोहन सिंह कह रहे हैं.. घटिया है।शरद यादव, रेल का काम समझा रहे हैं।योगी आदित्यनाथ, लॉलीपॉप बता रहे हैं।किसकी-किसकी बताएं..किसकी-किसकी सुनाएं।लालू की बकार नहीं निकल रही है।नीतिश निराशा की तपिश में झुलस रहे हैं।रामनाईक मुम्बई की चिंता में मरे जा रहे हैं।जैसे इनके रेलमंत्री बनते ही भारतीय रेल सुधर गयी थी।सुन लो... किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों भारतीय रेल हिजड़ों के आगे नपुंसक है। किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों भारतीय रेल भिखमंगों का जन्नत है।किसी नेता ने ममता से ये नहीं पूछा क्यों डाकूओं के आगे आरपीएफ गिड़गि
ड़ाती है।कैसे पूछेंगे जनाब..जब ऐसे गंभीर मसले पर आंखो पर राजनीतिक चश्मा चढ़ा हो।ममता के रेल बजट के बाद ऐसे निकम्मे माननीयों की औकात से जनता भी वाकिफ हो गयी होगी।जो वोट लेने के दौरान वादों की पटरीयां बिछा गए थे।ममता तो सियासी सिग्नलों को तोड़कर जनता के दिलों में फिक्रों की बर्छी की तरह घुसने की जुर्रत की है।ऐसी जुर्रत जो भारतीय रेल को क्षेत्रिय सीमाओं से आजाद करके मंजिल के सफर का साथी बनाती है।
No comments:
Post a Comment