इतिहास अपने दौर के नायकों का मकाम देखती है...."समय का सांचा जब आनंद के बिना हिंदुस्तान को परखेगा तो इस बात का एहसास होगा कि जिंदगी से ज्यादा मौत का सफऱ सुहाना होता है ना कोई छोर ना कोई चिंता"....चांद तारों से चलना है आगे...आसमानों से बढ़ना है आगे....पीछे रह जाएगा ये जमाना ...यहां कल क्या हो किसने जाना...तब राजेश खन्ना के किरदार की मौत हुई थी.....अब उस किरदार को किंवदती बनाने वाले आनंद की मौत हुई है...मौत से कुछ और मिले ना मिले...जिंदगी से तो जान छुटेगी ..मौत कभी भी मिल सकती है जीवन कल नहीं मिलेगा..."अभिनय के द्वीप" राजेश खन्ना का जाना एक युग का गुजर जाना है।इस वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि अविश्वसनीय विरोधो से भरे जीवन में "ईगो" को अपनी अदाओं से रोमांच में तब्दील करने का तजुर्बा, सांसों से मल्लयुद्ध में हार गया"। उनके अभिनय में जो बंजारापन था वो चारवाहा से लेकर उस्तादों की दिल जीत लेती थी...काका की अदाएं दिलों में फूलों की बर्छी की तरह लगती थी।"काका ने कला को काल की परिधियों से आजाद करके अभिनय के उस शिखर पर स्थापित कर दिया है जिसे छुने के लिए "आनंद" बनना पड़ेगा"....

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