बढते गये....जुड़ते गये...मिलते गये....खिलते गये....अपनी उम्मीद..टिके रहे...आवाजा निकली...डटे रहे....फरमाइश नहीं...फुर्सत निकालो....आवाज आयी...चलों जवानों..घड़ी है...बदलाव की....चलेगी नहीं ठहराव की...डंके की चोट पर...जिंदादिली की ज्योत पर....सरकार घबरायी...अन्ना की आंधी....सरकार डगमगायी...अन्ना की आंधी...बढते गए..कारंवा बनता गया...हिम्मत के हिमालय में सरकारी शर्तो की सुराख...हम रुके नहीं...हिले नहीं...भ्रष्टाचार के खिलाफ...गिले नहीं...हौंसलों की बांध पर....जज्बातों की जाल पर....साथी हाथ बढ़ाते गये...बच्चे बूढ़े...चिल्लाते रहे....बच्चा बच्चा बोलेगा...भ्रष्टाचार तोड़ेगा...जवानी चल पड़ी...सरकार हिल गयी...शर्तों की पैमाइश...लक्ष्य की गुंजाइश...हिन्दुस्तान जागा...बंधुत्व का धागा...चल पड़े दो डग...पूछते नहीं कब-कब...ये तूफान है...ये चट्टान है...अन्ना की शान है...सरकार पर सवाल है....बेइमानों का खाल है....चाहे उतार दो चमड़ी...चाहे उतार दो खाल...संसद में पारित होगा शान से लोकपाल...लोकतंत्र में भ्रष्टाचार...नहीं चलेगा नहीं चलेगा...देश के नेताओं शर्म करो....बहुत खाया अब धर्म करो....
सवा अरब लोगों को को एक सवाल के जवाब का इंतजार है लेकिन रामलीला मैदान से महज चार किलोमीटर दूरी पर रहने वाले पीएम को जवाब देने की फुर्सत नहीं।।ये सवाल है...जनलोकपाल का....ये सवाल है...आवाम की आवाज का...ये सवाल है आवाज की पहचान का।चार किलोमीटर दूर हिन्दुस्तान की धड़क रहा है लेकिन उसे सुनने को पीएम के पास फुर्सत नहीं।सवा अरब आवाम और आवाम की हसरतें और हसरतों की हिस्सेदारी के साथ ये क्रूर मजाक है।आवाम से कोई सरकार इतनी दूर कैसे हो सकती है कि चार किलोमीटर दूर से गरजते हिन्दुस्तान को नहीं सुन पा रही है। इस बैचानी और मजबूरी के पीछे की रवायत ने भारतीय राजनीति को शर्मिदा कर दिया है।इस दौर की सबसे बड़ी उथल-पुथल पर सरकार जनता का मजाक उड़ा रही है. और विपक्षी दल अपने दड़बों में छिप गए है। "जनता के उम्मीदों को धकिया कर...हुक्मरानों के आचरण में जो राजनीतिक निखार आ रहा है...कहीं ऐसा ना हो वो निखार...खूंखार हो जाए "। गजब है सरकार.... गजब है ….कांग्रेस और गजब है उसके रहनुमा।आवाम की हुंकार को भले ही अनसुना कर दें सरकार लेकिन भारतीय राजनीति में इसकी "गूंज" कांग्रेस से हिसाब से लेती रहेगी।
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