सरकार जैसे "बीपीएल कार्ड " थमाकर अनाज नहीं देती है वैसे ही "लोकपाल थमाकर सीबीआई नहीं देना चाहती "। अन्ना को इस "सरकारी कुतर्क" को समझने में 13 दिन वाले अनशन का रिकार्ड नहीं बल्कि "ऐसे सारे मिथक तोड़ना होगा जो दस जनपथ से संचालित होती है"। जब केन्द्र से एक रूपया गरीब के लिए चलता है तो उसके हाथ में 25 पैसा ही आता है।राजीव गांधी के इस बयान को अन्ना भूल कर पूरा एक रूपया मांगने की गलती कर बैठे थे। अन्ना कहते रह गए....सरकार सुनती रह गयी और जनता देखती रह गयी।"आजादी छाप पाकिस्तान " की तरह "आजादी " छाप लोकपाल बनाना चाहती है। तालिबानी धमाका करके ताली बजाएंगे और गिलानी सरकार देखती रह जाती है वैसे ही भ्रष्टाचारी घोटाला करेंगे और लोकपाल देखता रह जाएगा। "पैदा होने से पहले नसबंदी वाला ये लोकपाल पूरी दुनिया का पहला मामला है"। लोकपाल के दायरे में सीबीआई हो ना हो....ग्रुप सी हो ना हो....सिटीजन चार्टर हो ना हो...सरकार के लिए ये कोई बड़ा मसला नहीं है जितना की अब आरक्षण है। लोकपाल के नो एंट्री जोन में आरक्षण का परमिट देने की बात करके सरकार ने "गुस्से की ज्वालमुखी " को "सुनामी " बना दिया है।सवाल ये है कि जब सीबीआई,सीवीसी,चुनाव आयोग में आरक्षण नही है तो लोकपाल में क्यों।आरक्षण देने के लिए सरकार इतनी बेचैन थी कि लोकपाल में नहीं दे पाने का मलाल बर्दाश्त से बाहर हुआ तो ओबीसी कोटे में ही कोटा बनाकर साढ़े चार फीसदी आरक्षण का तोहफा अल्पसंख्यकों को सौंप दी। जब पूछो तो कहेंगे "मजबूत बिल " ला रहे हैं।जब पूछो तो कहेंगे "सशक्त बिल" ला रहे हैं। जब पूछो तो कहेंगे "ऐतिहासिक बिल " ला रहे हैं।मजबूत, शसक्त और ऐतिहासिक करते करते इतना "ताकतवर" बिल लेकर आयी है कि अब "इसे वापस लेने के लिए अनशन करना पड़ा रहा है "।सरकार.....अन्ना के मांगो में अनुप्रास लगाकर वीर रस से भरी रहती थी।"पिसान पोतकर भंडारी बनी" सरकार लोकपाल में "लोहे की तरह मजबूत" बिल बनाती रही ।फिर भी अगर "रामगोपाल वर्मा के शोले " की तरह लोकपाल ले आयी है तो सरकार के इस "नासमझी का सम्मान " करिए। अब ये मत पूछिएगा.....सरकार को भ्रष्टाचारियों के आंसू क्यों नहीं देखे जाते। मनमोहन सिंह से पूछिए जब महंगाई पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं तो देश में उनका क्या काम।चिदंबरम से पूछिए जब भ्रष्टाचार में खुद शामिल हैं तो गृहमंत्रालय में उनका क्या काम।राहुल से पूछिए "संवेदना का लाइसेंस" दस जनपथ से बनता है "उम्र के हिसाब" से बनाया जाता है।"सरकार अपने ऊपर लगे लांछनों को अपनी खूबियां बताकर ऐसे चहकती है कि पूरी बात "विशेषण " बन जाती है।लेकिन अन्ना तो सरकार के "समुच्चय बोध " को "विस्मयकारी बोध" में बदलने के लिए "अपव्यय की सभी कलाओं" से वाकिफ हैं। इस दौरान अगर मनमोहन सिंह "मध्यम पुरूष" से "उत्तम पुरूष का सर्वनाम " बन गए तो यकीन मानिए लोकपाल की लड़ाई में "पाल" तो रहेगा लेकिन "लोक " नया प्रत्यय बन जाएगा "।
कांग्रेस वालो का संकर सिंह बाघेला के बारे मे क्या विचार हैं . वो तो आर एस एस का परचारक था. यदि अन्ना हज़ारे सिर्फ़ एक फोटो से आर एस एस के एजेंट हो सकते हैं तो क्या बाघेला को तुलसी पते खिलाकर कॉंग्रेस ने सुध कर लिया है. सोनिया गाँधी के ना जाने किस किस के साथ फोटो हैं. क्या वो भी उन देशों की एजेंट है. ये सब कॉंग्रेस की बचकाना हरकत है. बचपना है
ReplyDeleteसंघ के "प्रचारक वाले पोस्ट" स ज्यादा कांग्रेस के "दुष्प्रचारक" वाले पोस्ट का रूतबा ज्यादा है। जैसे "शालीनता की न्यूनतम अपेक्षा" कांग्रेस से नहीं की सकती वैसे ही लोकपाल में मजबूती की अधिकतम अपेक्षा नहीं की जा सकती।
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