Monday, November 19, 2018

Z...एक 'कलंक' जिसे पूरा तेलंगाना ढोता है

 वैसे तो  ABCD की महिमा अपरंपार है लेकिन आज  'Z' टू A चलना होगा। तेलंगाना की सड़कों पर चलते हुए आपका ध्यान खींचेगी वहां चलने वाली सरकारी बस। कैटेगिरी के हिसाब से अलग अलग रंग,अलग अलग रेट। कुछ कॉमन है तो नंबर प्लेट पर लिखा ‘Z’।इसी अंग्रेजी के आखिरी अक्षर की कहानी ये है।इस 'Z' की कहानी आपको उसी हैदराबाद के निज़ाम तक लेकर जाएगी जिसके इतिहास को हर किसी ने अपनी अपनी कलम के कलर के हिसाब से लिखा है,काला, लाल, नीला और सफेद।  हर सरकारी बस पर लिखा 'Z' गुमान और गुस्ताखी के बीच समझौते का साइन है। 'Z' की कहानी हैदराबाद के भारत विलय की तरह फिल्मी है।एक दौर था जब आजादी से पहले हिन्दुस्तान में कहीं बस नहीं चलती थी। उस दौर में हैदराबाद रियासत में बसों का बेड़ा हुआ करता था । ये बस हैदराबाद के निजामउस्मान अली खान चलवाते थे । इन बसों की बदौलत निजाम ने 1932 में देश का पहला ट्रांसपोर्ट बनाया था । जिसका नाम ‘निजाम स्टेट रेल एंड रोड ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट’ था। आजादी के दौरान भारत संघ में रियासतों का विलय हो रहा था तब हैदराबाद के निजाम ने विलय से इनकार कर दिया था। तब  सरदार पटेल के ऑपरेशन पोलो चलाया। जब हैदराबाद रियासत का भारत में विलय हुआ तो निजाम ने तमाम अजीबोगरीब शर्तों में से एक शर्त रखी थी । उसी शर्त से 'Z' की एन्ट्री होती है । निजाम की  शर्त थी.. हैदराबाद रियासत के ट्रांसपोर्ट का नाम उनकी मां ज़ोहरा बेगम के नाम पर रखा जाए । अब इतना लंबा चौड़ा नाम तो डाला नहीं जा सकता था लेकिन हैदराबाद को भारत में शामिल भी करना था लिहाजा शर्त मान ली गई। शुरुआत का इतिहास लिखित तो नहीं मिलता लेकिन जानकारों के मुताबिक धीरे धीरे ज़ोहरा,’Z’पर सिमट गया। माताजी का नाम भी हो गया,हैदराबाद भी मिल गया। इसके बाद से सभी सरकारी बसों के नंबर प्लेट पर Z लिखा जानेलगा। निज़ाम भले ही अपने ‘पसंदीदा पाकिस्तान’ चले गए लेकिन Z यहीं रह गया। भारत की सांस्कृतिक विविधता बनकर। इतिहास में Z के ज़िक्र पर कोई जंग तो नहीं हुई,हां कानूनी तौर पर Z सरकारी बसों का अनिवार्य हिस्सा बन गया। दिए गए चित्र में नंबर प्लेट के बीचों बीच 'Z' का रूतबा साफ झलक रहा है । 

      अब थोड़ा Z से A की तरफ चला जाए क्योंकि निज़ाम की बात हो और कोई भी हैरानी से मुंह खोलने वाली बात ना बताई जाए तो पाठक बुरा मान सकता है।इसलिए एक के साथ एक किस्सा फ्री।ये किस्सा उस दौर का है जब युद्द के बाद सोने की चिरैया कंगाल हो चुकी थी। तब निज़ाम से मदद मांगी गई। तब निज़ाम ने भले ही 5 टन सोना दे दिया (आज के हिसाब से करीब 15 सौ करोड़) लेकिन जिन बक्सों में सोना भरकर भेजा गया वो निज़ाम ने वापस मांग लिए। निज़ाम की दरियादिली के साथ साथ हद कंजूसी के किस्से फिर कभी।

2 comments:

  1. बेहद रोचक जानकारी, मैं भी हैदराबाद रहा लेकिन इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। रोचक जानाकरी देने के लिए तमाशा चालू है ब्लॉग का शुक्रिया।

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